भारत की बुनियादी शिक्षा पर निबंध | buniyaadee shiksha par nibandh

भारत की बुनियादी शिक्षा पर निबंध | buniyaadee shiksha par nibandh विस्तार में पढ़े। 

 

भारत की बुनियादी शिक्षा पर निबंध

पिछले सौ वर्ष में भारत में जो शिक्षा प्रणाली चलती रही, वह किसी समय लार्ड मैकाले ने यहां चलाई थी। उसका उद्देश्य भारतवासियों को यूरोपियन ढ़ांचे में ढालना और सरकारी काम – काज के लिए क्लर्क तैयार करना था। उस शिक्षा से किसी समम लोगों ने काफी लाभ उठाया। जो लोग जैसे – तैसे मैट्रिक तक भी पड़ जाते थे, उन्हें भी सरकारी नौकरी मिल जाती थी। वे आसानी से अपनी जिन्दगी पूरी कर जाते थे। शिक्षा इस देश में बहुत समय तक नौकरी पाने का ही साधन बनी रही।

फिर धीरे – धीरे समय बदला। राष्ट्रीय नेताओं ने विदेशी शिक्षा के दोषों को अनुभव किया और उसे बदलने की मांग की। शायद उनकी आवाज का कुछ भी असर न होता ; परन्तु एक बड़ा परिवर्तन यह हुआ कि नौकरी मिलने की आशा में जो लोग पढ़ – लिखकर विश्वविद्यालयों से बी ० ए ० और एम ० ए ० की डिग्रियां लेते थे, अब उन्हें भी बेकार बैठे रहना पड़ता था। यत्न करने पर भी नौकरी नहीं मिलती थी। इन पढ़े – लिखे लोगों की दशा बड़ी दयनीय होती थी।

पढ़े – लिखे होने के कारण वे मेहनत – मजदूरी का काम करना पसन्द नहीं करते थे ; और कोई अन्य कला या व्यवसाय उन्हें प्राता नहीं था। उनके सामने दो ही विकल्प थे या तो नौकरी पा लें या फिर परकटे पंछी की तरह निकम्मे पड़े – पड़े भूखों मरें। इस समस्या के कारण भी पुरानी चली आ रही शिक्षा प्रणाली को बदलने की ओर ध्यान दिया गया। गांधी जी ने शिक्षा के इन दोषों की ओर बहुत पहले ध्यान दिया था और सन् १ ९ २७ में उन्होंने वर्षों में एक शिक्षा योजना प्रस्तुत की थी।

इसे कभी – कभी ‘ वर्षा शिक्षा योजना भी कहा जाता है और कभी – कभी इसे बुनियादी तालीम ‘या’ नई तालीम ‘ नाम भी दिया जाता है।बुनियादी शिक्षा में आधारभूत मान्यता यह है कि विद्यार्थी को शिक्षा किताबों के आधार पर न दी जाए ; बल्कि वह जिन परिस्थितियों में रहता है, उन परि स्थितियों के माध्यम से ही उसे सब विषयों की शिक्षा दी जाए। उदाहरण के लिए प्राथमिकबुनियादी शिक्षा में बच्चों को कातना, बुनना, बड़ईगीरी और खेती इत्यादि के काम सिखाए जाते हैं।

गणित, भूगोल, इतिहास, वनस्पति – विज्ञान इत्यादि सभी विषय इन उपयोगी व्यवसायों के सहारे ही सिखाए जाते हैं। परि रणाम यह होता है कि बालक उस विषय का केवल किताबी ज्ञान प्राप्त नहीं करता, बल्कि उसे व्यवहार में लाना भी सीख जाता है। दूसरी बात यह है कि उसका केवल मन ही विकसित नहीं होता, बल्कि आंख और हाथ में भी कला और कौशल आ जाता है। शरीर का व्यायाम होता है, जिससे स्वास्थ्य अच्छा रहता है। और सबसे बड़कर बात यह है कि उसकी पढ़ाई उसे शारीरिक श्रम के प्रति घृणा नहीं सिखाती।

वह मेहनत करते हुए पड़ता है और पड़ते हुए मेहनत करता है। इस लिए पढ़ने के बाद भी मेहनत करता रह सकता है। वेसिक शिक्षा का एक बहुत बड़ा गुण यह है कि यह पुराने ढंग की चालू शिक्षा की अपेक्षा सस्ती होती है। यदिबुनियादी स्कूलों में ठीक ढंग से काम किया और कराया जाए, तो वे अपना खर्च खुद निकाल सकते हैं और भारत जैसे गरीब देश में, जहां किसी भी मब पर बड़ी राशि खर्च कर पाना सरकार के लिए कठिन होता है, ऐसी शिक्षा प्रणाली बहुत ही प्रशंसनीय और उपयोगी है।

बुनियादी शिक्षा के समर्थकों का तो कथन यहां तक है कि ऐसे विद्यालयों में अध्यापकों और विद्या थियों के श्रम से इतनी कमाई हो सकती है कि विद्यालय का खर्च निकालने के बाद भी कुछ बचत हो जाए। स्वाधीनता पाने के बाद भारत मेंबुनियादी शिक्षा कई स्थानों पर चालू की गई। गांवों में बहुत – सेबुनियादी विद्यालय खोले जा चुके हैं और सरकार की यह योजना है कि गांओं में सभी विद्यालयों को धीरे – धीरेबुनियादी विद्यालयों के रूप में परिवर्तित कर दिया जाए।

इस विषय में मन्द प्रगति का कारण यह है किबुनियादी शिक्षा देने के लिए उपयुक्त शिक्षकों का प्रभाव है। ज्यों – ज्यों ऐसे शिक्षक प्रशिक्षित होते जाएंगे, त्यों – त्योंबुनियादी विद्यालयों की संख्या बढ़ती जाएगी। किन्तु इस बीच मेंबुनियादी शिक्षा के विरोध में भी कुछ आवाज उठने लगी है। अभी तक सरकार की नीति यह रही है किबुनियादी विद्यालय गांवों के इलाकों में खोले जाएं और शहरी क्षेत्रों में पुराने ढंग की शिक्षा – पद्धति ही चालू रहे।

इससे देहाती लोगों में यह सन्देह फैल चला है कि शायदबुनियादी शिक्षा पद्धति कुछ पटिया वस्तु है और इसीलिए वह हमपर थोपी जा रही है। उनका कथन है कि यदि यह सचमुच उतनी ही उपयोगी है, जितनी कि बताई जाती है, तो इसका प्रारम्भ शाहरों में भी क्यों नहीं किया जाता ?बुनियादी शिक्षा में कम खर्च होने की युक्ति भी गलत सिद्ध हुई है। व्यवसाय सिखाने के लिए जो सामग्री संगाई जाती है, वह काफी खर्चीली पड़ती है। और विद्यार्थी सीखने की दशा में जो सामान तैयार करते हैं, वह उपयोग के योग्य नहीं होता।

इसलिए बाजार में उसकी बिक्री नहीं हो पाती। इस प्रकार सामान्य शिक्षा में व्यवसाय के लिए जो खर्च नहीं होता था, वहबुनियादी शिक्षा में होता है और सामान्य शिक्षा से भी अधिक महंगी पड़ती है।बुनियादी शिक्षा में छात्र का ध्यान अनेक दिशाओं में बंट जाता है। स्वभाव से वह क्रीडाप्रिय होता है और किताबी शिक्षा प्रारम्भ में उसे बोझ मालूम होती है।

इसलिए वेसिक शिक्षा के विद्यालयों में विद्यार्थी पढ़ने – लिखने के बजाय उन व्यव सायों की ओर अधिक झुकता है, जो उसे सिखाए जाते हैं। परन्तु उन व्यवसायों में भी उसकी रुचि इसलिए नहीं होती कि वह उन्हें सीखना चाहता है। अपितु इस लिए होती है कि उनकी आड़ में वह कितावी शिक्षा से बच सकता है। बहुत बार जो व्यवसाय विद्यालयों में सिखाए जा रहे होते हैं, उनका विद्यार्थी के भावी जीवन से कोई सम्बन्ध नहीं होता। इस प्रकार वह किताबी शिक्षा और व्यावसायिक शिक्षा दोनों से वंचित हो जाता है।

यदि किसी प्रकार वह कोई व्यवसाय सौख भी ले, तो भावी जीवन में उसका उपयोग न करने के कारण वह सीखा न सीखा बराबर ही होता है। किसी दिन विपत्ति या संकट के समय वह व्यवसाय – ज्ञान उसके काम मा सकता था, यह युक्ति बहुत संतोषजनक नहीं है। सिद्धांत की दृष्टि से बहुत आकर्षक होने पर भी व्यावहारिक दृष्टि सेबुनियादी शिक्षा बहुत सफल नहीं हो पाई। अनेक आगहबुनियादी विद्यालयों का निरीक्षण करने पर यह देखा गया कि जो व्यवसाय या उद्योग उन विद्यालयों में सिखाए जा रहे थे, वे आसपास की सामाजिक और भौगोलिक परिस्थितियों के प्रतिकूल थे।

उदाहरण के लिए ऐसे गांवों में, जहां जुलाहे ही जुलाहे रहते थे, विद्यार्थियों को बढ़ईगीरी का काम सिखाया जा रहा था ; और जहां कुम्हारों की अधिकता थी, वहां कपड़ा बुनने का। इससे यह स्पष्ट हो जाता है किबुनियादी शिक्षा एक ऐसी प्रणाली है, जिसका बहुत सूझबूझ के साथ पालन न करने से यह एक निरर्थक पाखंड के रूप में बदली जा सकती है। इस पाखंड – रूप में बदल जाने की सम्भावना तब और भी अधिक है, जब किबुनियादी शिक्षा में धर्म की – सी निष्ठा रखने वाले शिक्षकों का प्रभाव हो।

यदि शिक्षक सचमुच ईमानदार, सुशिक्षित औरबुनियादी शिक्षा के सिद्धांत में विश्वास रखने वाले हों, तो कुछ थोड़े – से गिने – चुने लोगबुनियादी विद्यालयों में शिक्षा को उपयोगी, सस्ता और रोचक बना सकते हैं। किन्तु जहाँ शिक्षकों की भर्ती लाखों की संख्या में की जानी हो, वहां यह आशा करना कि सभी शिक्षक परिश्रमी, ईनानदार और सूझबूझ वाले होंगे, गलती होगी। उस दशा मेंबुनियादी शिक्षा से दे लाभ नहीं हो पाएंगे, जो कि सिद्धांत में बताए गए हैं। प्रारम्भ मेंबुनियादी शिक्षा के सम्बन्ध में लोगों में बहुत उत्साह था।

सरकार ने भी बड़े पैमाने परबुनियादी विद्यालय खोलने की योजना बनाई थी और सब वर्त मान विद्यालयों कोबुनियादी विद्यालयों के रूप में परिवर्तित करने का निश्चय किया था। किन्तु पिछले दिनोंबुनियादी शिक्षा के विरुद्ध कई कठोर पालोचनाएं हुई हैं और इस सम्बन्ध में उत्साह कुछ मन्द पड़ गया दीखता है। बड़े – बड़े अफसर, मन्त्री तथा अन्य सम्पन्न लोग अपने बच्चों कोबुनियादी विद्यालयों में भेजना पसन्द नहीं करते। इसलिए जनसाधारण में भी यह भावना फैल रही है किबुनियादी शिक्षा वस्तुतः उपयोगी शिक्षा नहीं है।

विशुद्ध सिद्धान्त की दृष्टि सेबुनियादी शिक्षा को गांधीवाद का एक अंग समझा जाना चाहिए। गांधीवाद जीवन के किसी एक क्षेत्र को नहीं, बल्कि सब क्षेत्रों को व्याप्त करके चलता है। अगर हमारे सारे समाज का निर्माण गांधीवाद के आधार पर होना हो, तोबुनियादी शिक्षा किसी सीमा तक उपयोगी हो सकती है। गांधी वादी समाज में भारी उद्योगों के लिए स्थान नहीं है ; परन्तु हमारी वर्तमान सर कार भारी उद्योगों को प्रोत्साहन दे रही है और वर्तमान विज्ञान – प्रधान युग में यह आवश्यक भी है।बुनियादी शिक्षा का वर्तमान वैज्ञानिक और भारी उद्योगों वाली सभ्यता के साथ पूरा मेल नहीं बैठता।

यदि आज के विद्यार्थियों को बड़े होकर अपना जीवन आधुनिक वैज्ञानिक कृषि और उद्योगों में व्यतीत करना हो, तो उनके लिएबुनियादी शिक्षा कुछ भी सहायक नहीं हो सकती ; अपितु उनको किताबी शिक्षा की ओर से विमुख करना शायद उनके लिए हानिकारक ही सिद्ध हो। परन्तुबुनियादी शिक्षा प्रभी परीक्षणात्मक दशा में है और जब यह परीक्षण एक बार शुरू कर दिया गया है, तो इसे कुछ दिन तो चलाया ही जाएगा और यदि छोड़ा गया, तो तभी छोड़ा जाएगा, जब इसमें सफलता की कोई भी संभावना दीख नहीं पड़ेगी।

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