सर चंद्रशेखर वेंकटरमन हिंदी निबंध | chandrashekhar venkataraman hindi essay

सर चंद्रशेखर वेंकटरमन हिंदी निबंध | chandrashekhar venkataraman hindi essay विस्तार में पढ़े। 

भारत के जिन मेधावी महापुरुषों ने अपने देश का यश दूर – दूर विदेशों में फैलाया है, उनमें श्री चन्द्रशेखर बैंकट रमन का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। जिस प्रकार अध्यात्म के क्षेत्र में स्वामी विवेकानन्द और अरविन्द ने, काव्य के क्षेत्र में रवीन्द्रनाथ ने और राजनीति के क्षेत्र में महात्मा गांधी ने भारत की यशाःपताका सारे संसार में फहराई, उसी प्रकार विज्ञान के क्षेत्र में पहले भारत का नाम उज्वल करने वाले बी चन्द्रशेखर वेंकट रमन और आचार्य जगदीशचन्द्र बोस थे। इनकी सफलता का महत्व और भी अधिक इसलिए है, क्योंकि विज्ञान के क्षेत्र में भारत बहुत पिछड़ा हुआ समझा जाता था और इस क्षेत्र में आगे बढ़ने के अवसर यहां नहीं के बराबर थे।

 

सर चंद्रशेखर वेंकटरमन हिंदी निबंध

श्री रमन का जन्म एक मध्यवित्तीय विद्याव्यसनी परिवार में हुआ। उनके पिता श्री चन्द्रशेखर अय्यर कालेज में प्रोफेसर थे। उन्हें गणित, भौतिकी विज्ञान, खगोल विज्ञान और संगीत में बहुत रुचि थी। श्री रमन में भी इन विद्याओं और कलाओं के प्रति चाव अपने पिता के कारण ही उत्पन्न हुआ। श्री रमन की माता श्रीमती पार्वती अम्मल बहुत धैर्यशील और हड़ संकल्प वाली महिला थी। इस परिवार में ७ नवम्बर, १८८८ को बालक रमन का जन्म हुम्ला। माता – पिता की देख – रेख में रहकर बालक की स्वाभाविक प्रतिभा का विकास बहुत भली भांति हो सका।

बारह वर्ष की आयु पूरी होने से पहले ही बालक रमन मैट्रिक पास कर कालेज में प्रविष्ट हुआ। अपनी कक्षा में सबसे कम आयु होने पर भी उसका ज्ञान अन्य छात्रों की अपेक्षा कुछ अधिक ही था। इस कारण वह अपने प्रोफेसरों का प्रिय छात्र बन गया। कालेज में पढ़ते समय श्री रमन का झुकाव पहले गणित और विज्ञान की ओर था। कुछ समय बाद श्रीमती ऐनी बैसेंट की थियोसोफी का प्रभाव उनपर पड़ा।

कुछ समय तक उनकी रुचि धार्मिक साहित्य की ओर भी रही, पर अन्त में वे फिर विज्ञान की ही मोर मुक पाए। वी ० ए ० में भौतिकी विज्ञान में सर्वप्रथम रहने के कारण उन्हें ‘ परणी स्वर्णपदक ‘ प्रदान किया गया। इत्तसे उत्साहित होकर उन्होंने आगे भी भौतिकी विज्ञान के अध्ययन को ही जारी रखने का निश्चय किया। कालेज में पढ़ते समय ही श्री रमन ने विज्ञान के क्षेत्र में कुछ ऐसी नई बातें खोज निकाली थीं जो आश्चर्यजनक थीं। इस प्रकार के अनुसन्धान सम्बन्धी उनके कई लेख विदेशों के मासिक पत्रों में भी प्रकाशित हो चुके थे।

इससे उनका उत्साह और अधिक बड़ा। मद्रास विश्वविद्यालय में विज्ञान विषय लेकर प्रथम श्रेणी में एम ० ए ० पास करने वाले वे पहले छात्र थे।श्री रमन के अध्यापक प्रोफेसर जोन्स उनसे बहुत प्रसन्न थे और उन्होंने सिफारिश करके श्री रमन को इंग्लैंड में विज्ञान का अध्ययन करने के लिए छात्र वृत्ति दिलवा बी। इस सुपवसर को पाकर श्री रमन बहुत प्रसन्न हुए।

परन्तु जहाज पर सवार होने से पहले डाक्टर ने उन्हें विदेश जाने के अयोग्य बताया, क्योंकि वे बहुत कृश और दुर्बल थे। डाक्टर ने यह भी कहा कि इंग्लैंड का बहुत ठंडा जलवायु उनके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक सिद्ध हो सकता है। श्री रमन को इससे बड़ी निराशा हुई। विज्ञान के क्षेत्र में आगे बढ़ने का मार्ग न देखकर श्री रमन अखिल भारतीय वित्त – प्रतियोगिता परीक्षा में बैठ गए और अपनी प्रतिभा और परिश्रम के बल पर उसमें सर्वप्रथम नम्बर पर पास हुए। इस समय उनकी आयु केवल १५ वर्ष थी।

इस परीक्षा में पास हो जाने के कारण वे कलकत्ता में वित्त – विभाग में उप महालेखाकार के पद पर नियुक्त हो गए। इसके बाद उनका विवाह हो गया और कुछ दिन तक जीवन की गाड़ी सामान्य लीक पर चलती रही। पर उनका विज्ञान का शौक एकदम समाप्त नहीं हो गया था। एक दिन सड़क पर जाते हुए उनकी दृष्टि एक साइनबोर्ड पर पड़ी भारतीय विज्ञान विकास – संघ। वे जाकर इस संघ के मंत्री से मिले और यह अनुमति प्राप्त कर ली कि वे अपने खाली समय में संघ की प्रयोगशाला में अपने परीक्षण कर सकते हैं।

इस प्रकार दिन भर दफ्तर में काम करने के बाद शेष समय वे विज्ञान के परीक्षणों में बिताने लगे। अपने परीक्षणों का विवरण और उनसे निकाले गए निष्कर्ष लिख – लिखकर वे पत्र – पत्रिकाओं और दूसरे प्रसिद्ध विज्ञानवेत्ताओं के पास भेजते। कुछ ही समय में उनकी गिनती कुशाल विज्ञानवेत्ताओं में होने लगी। अब एक कठिनाई यह हुई कि उनका तबादला कलकत्ता से रंगून हो गया और कलकत्ता में प्रयोगशाला की जो सुविधा थी, वह रंगून में न रही।

परन्तु १ ९ ११ में वे फिर कलकत्ता लौट आए और फिर उसी तरह अपने परीक्षणों में मग्न रहने लगे। १ ९ १६ में कलकत्ता विश्वविद्यालय की ओर से विज्ञान कालेज खोला गया। कलकत्ता विश्वविद्यालय के उपकुलपति उन दिनों आशुतोष मुखर्जी थे। वे श्री रमन से परिचित थे और चाहते थे कि किसी प्रकार इस कालेज में श्री रमन को विज्ञान के प्रोफेसर के रूप में नियुक्त कर लिया जाए। परन्तु कठिनाई यह भी कि श्री रमन को जितना वेतन उपमहालेखाकार के पद पर मिल रहा था उतना कालेज में नहीं मिल सकता था।

उस समय श्री रमन ने अधिक वेतन छोड़कर कम वेतन पर विज्ञान का प्रोफेसर बनना स्वीकार कर लिया। एक कठिनाई फिर भी आ पड़ी। विज्ञान कालेज की स्थापना के लिए बहुत बड़ी धनराशि श्री ताररूनाथ पालित ने दी थी। वे यह शर्त लगा गए थे कि विज्ञान का प्रोफेसर उसी व्यक्ति को नियुक्त किया जाए, जिसने विदेश में विज्ञान की शिक्षा प्राप्त की हो। श्री रमन ने न तो विदेश में शिक्षा पाई थी, और न वे इस शर्त को पूरा करने के लिए विदेश जाने को तैयार ही थे।

अन्त में बिना इस शर्त को पूरा किए ही श्री रमन को कालेज में विज्ञान का प्रोफेसर नियुक्त कर लिया गया। कालेज में पहुंच जाने पर श्री रमन को अपनी रुचि का ही काम मिल गया। अब वे अपना सारा समय विज्ञान की खोजों में लगाने लगे। प्रकाश और ध्वनि के सम्बन्ध में उन्होंने अनेक नये आविष्कार किए। इनके परिणामस्वरूप इससे पहले की अनेक धारणाओं में आमूलचूल परिवर्तन हो गया। श्री रमन ने पहले पहल इस रहस्य का उद्घाटन किया कि आकाश नीला क्यों दिखाई पड़ता है और समुद्र में तैरने वाले विशाल हिम – पौल नीले क्यों दीख पड़ते हैं।

इस क्षेत्र में उन्होंने सबसे बड़ी खोज की, उसे ‘ रमन – प्रभाव ‘ कहा जाता है। इस ‘ रमन – प्रभाव ‘ के लिए ही १६३० में उन्हें संसार का सबसे बड़ा पुरस्कार नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ था। श्री रमन ने विज्ञान के अनेक क्षेत्रों में अनुसन्धान किए। उन्होंने यह भी खोज की कि धातुओं में एक वैद्युतिक तरल पदार्थ विद्यमान रहता है। वह निरन्तर गति करता रहता है और इस गति के कारण ही ठोस धातुओं के अंदर भी प्रकाश की किरणें प्रवेश कर जाती हैं।

अपनी इस प्रकार की अनेक खोजों को श्री रमन ने पत्रिकाओं और पुस्तकों के रूप में प्रकाशित करवाया, जिससे उनकी पाक सारे संसार में बैठ गई। श्री रमन का यश सब ओर फैल जाने का परिणाम यह हुआ कि संसार के सभी देशों के विश्वविद्यालयों की ओर से उनके पास भाषण देने के लिए निमन्त्रण पाने लगे। इन भाषणों के सिलसिले में श्री रमन अनेक देशों की यात्रा कर चुके हैं। १ ९ २६ में वे भारतीय विज्ञान कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए। इंग्लैंड की रायल सोसायटी ने उन्हें अपना ‘ फलो ‘ बनाया, जो बहुत बड़ा सम्मान है।

उसी वर्ष उन्हें ‘ नाइट ‘ की भी उपाधि दी गई। विज्ञान कालेज में सेवाकाल पूरा हो जाने के बाद श्री रमन ने बंगलौर के भारतीय विज्ञान प्रतिष्ठान ( इण्डियन इंस्टीट्यूट आफ साइंस ) का काम संभाल लिया और इस समय बड़ी योग्यता के साथ उसे कर रहे हैं। भारत सरकार ने आपको आपकी सेवाओं के लिए पद्मविभूषण ‘ की उपाधि से सम्मानित किया है। इतना यश और सम्मान प्राप्त होने के बाद भी श्री रमन बहुत सरल और साधु स्वभाव के व्यक्ति हैं। सरस्वती के सच्चे पुजारी का आदर्श जीवन आप व्यतीत करते हैं।

प्रतिमा और परिश्रम का जैसा मणि – कांचन संयोग आपमें दिखाई पड़ता है, वह संसार में दुर्लन ही है। उनकी सफलता का जितना श्रेय उनकी प्रतिभा को है, उससे कम उनके परिश्रम को नहीं है। क्या यह आश्चर्य की बात नहीं है कि जिस व्यक्ति को स्वास्थ्य दुर्बल होने के कारण विदेश जाने से रोक दिया गया था, वह इतने दीर्घकाल तक इतना कठोर परिश्रम करता हुआ जीवन में इतनी बड़ी सफलता प्राप्त कर दिखाए।

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