छत्रपति शिवाजी महाराज निबंध | chhatrapati shivaji essay in hindi

chhatrapati shivaji essay in hindi भारत में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं जिसने छत्रपति शिवाजी महाराज का नाम न सुना है, ये एक ऐसे राजा थे जिन्होंने मुग़ल साम्रज्य को उखाड़कर मराठा एव हिन्दू साम्रज्य स्थापित किया था। तो चलिए छत्रपति शिवाजी महाराज निबंध के माधयम से उनकी जीवनी को पढ़ते है।

छत्रपति शिवाजी महाराज निबंध | chhatrapati shivaji essay in hindi

छत्रपति शिवाजी महाराज निबंध

भारतीय इतिहास में शिवाजी का नाम सर्वश्रेष्ठ सेनापतियों में गिना जाता है। उनका जन्म एक सामान्य परिवार में हुआ था ; किन्तु अपनी सूझ – बूझ, वीरता और साहस के बल पर उन्होंने मराठा साम्राज्य की स्थापना की और उस समय की सबसे बड़ी शक्ति मुगल साम्राज्य से टक्कर ली। शिवाजी उस समय के अत्याचारी मुगल शासन के विरुद्ध विद्रोही बनकर खड़े हुए थे। इस कारण देश वासी एक राष्ट्रनेता के रूप में भी उनका सम्मान करते हैं।

शिवाजी के पिता शाहजी बीजापुर दरबार के एक सामन्त थे और शिवाजी की माता जीजाबाई बहुत धर्मपरायण महिला थीं। शिवाजी जो कुछ बने, उसका अधिकांशा श्रेय उनकी माता को ही है। जीजाबाई ने बाल्यकाल में ही वीरता की अनेक गाथाएं सुना – सुनाकर शिवाजी के मन में साहस की भावना कूट – कूटकर भर दी थी।

क्षत्रिय बालक को घुड़सवारी करना, तलवार और भाला चलाना आदि जो विद्याएं आनी चाहिएं, वे सब शिवाजी ने बहुत जल्दी सीख ली थीं। जब शिवानी बालक ही थे, तभी वे सड़ाइयों और दुर्ग जीतने के खेल खेला करते थे। उन्होंने बहुत – से साथी इकट्ठे कर लिए थे और उनकी एक छोटी – सी सेना तैयार कर ली थी। इन साथियों की सहायता से एक बार उन्होंने खेल ही खेल में बीजापुर राज्य के कुछ किलों पर सचमुच ही अधिकार कर लिया।

बदले में बीजापुर के नवाब ने उनके पिता शाहजी को कैद कर लिया। अपने पिता को कैद से छुड़ाने के लिए शिवाजी को वे किले वापस लौटा देने पड़े। कुछ समय बाद उन्होंने मुगल साम्राज्य की ओर मुख मोड़ा और उनके किलों पर अधिकार करना शुरू कर दिया। इससे दिल्ली के मुगल बादशाह और बीजापुर का सुल्तान, दोनों उनके विरोधी हो गए और शिवाजी को कुचलने का उपाय सोचने लगे।

एक – एक करके शिवाजी ने बहुत – से किलों पर कब्जा कर लिया था और अपना एक छोटा – मोटा राज्य ही खड़ा कर लिया था। बीजापुर के सुल्तान ने अफजल खां नामक सेनापति को शिवाजी को दबाने के लिए भेजा। अफजल खां बड़ा अभिमानी और धूर्त सेनापति था। उसने शिवाजी के साथ संधि की चर्चा चलाकर उन्हें धोखे से कैद करना चाहा।

यह तय हुआ कि था शिवाजी और अफजल खां एक तम्बू में मिलेंगे और यहां संधि की शर्ते तय कर लेंगे। शिवाजी सावधान थे और इस बात के लिए तैयार थे कि शत्रु उनके साथ धोखा कर सकता है। अफजल खां ने मिलते ही शिवाजी को बगल में दबाने की कोशिश की और जब वे काबू में न आए, तो उसने उनपर तलवार से वार किया। तलवार सिर पर लगी, पर शिवाजी ने सिर पर लोहे का शिरस्त्राण पहना हुआ था।

उसके कारण वे बच गए। तब उन्होंने अफजल खां को पकड़ लिया और बखनखों से उसका पेट चीर दिया। उसके बाद शिवाजी की सेना ने अफजल खां की सेना को लूट लिया और तम्बुओं में आग लगा दी। बीजापुर को सेना में फिर कभी शिवाजी का सामना करने का दम न रहा। पिशवाजी की सफलता से दिल्ली का बादशाह औरंगजेब बहुत चिन्तित हुआ। उसने अपने मामा शाइस्ता खां को एक बड़ी फौज देकर शिवाजी को हराने के लिए भेजा।

इस फौज के साथ जोधपुर के राजा जसवन्तसिंह भी थे। मुगलों की फौज बहुत बड़ी थी। उसने धीरे – धीरे आगे बढ़ते हुए पिशवाजी के बहुत से किलों पर कब्जा कर लिया। शिवाजी की राजधानी पूना थी। शाइस्ता खां ने पूना पर भी अधिकार कर लिया। कुछ समय बाद शाइस्ता खां बेफिक्र हो गया और आराम से पूना में रहने लगा।

एक दित रात के समय शिवाजी और उनके सिपाही एक बरात का स्वांग भरकर बाहर में घुस आए। आधी रात के समय जब सब लोग सो रहे थे शिवाजी और उनके सैनिकों ने उस महल पर धावा बोल दिया जिसमें शाइस्ता खा रहता था। शाइस्ता खां बड़ी मुश्किल से जान बचाकर भाग सका। उस रात की लड़ाई में हजारों मुगल सिपाही मारे गए। शाइस्ता खां को वापस लौट आना पड़ा। इसके बाद औरंगजेब ने जयपुर के राजा जयसिंह को शिवाजी के विरुद्ध लड़ने भेजा।

जयसिंह ने शिवाजी को समझाया कि इस समय औरंगजेब से लड़ने में कोई लाभ नहीं है। अच्छा यह हो कि आप भी औरंगजेब के सामन्त बनकर मुगल दरबार में आ जाएं और फिर हम सब लोग मिलकर औरंगजेब पर दबाव डाल सकेंगे। शिवाजी तैयार हो गए वे दिल्ली गए। परन्तु औरंगजेब ने उन्हें पांच – हजारी मन सबदार बनाया। शिवाणी ने इसे अपना अपमान समझा और उन्होंने औरंगजेब को कुछ कटु वचन कह दिए। इसपर उन्हें उनके मकान में ही नजरबन्द कर दिया मया।

उस समय शिवाजी ने एक चाल चली। उन्होंने अपने बहुत अधिक बीमार होने की खबर सथ और फैलवा दी। कुछ दिन बाद उनके स्वस्थ होने की खबर फैली और स्वस्थ होने की खुशी मिठाइयों के टोकरे अपने इष्ट – मित्रों के पास भिज वाने लगे। अन्त में शाम के समय ऐसे ही मिठाई के टोकरों में बैठकर शिवाजी अपने पुत्र सम्भाजी को साथ लेकर औरंगजेब की कैद से निकल भागे।

कुछ दिन वे साधु का वेश बनाकर यात्रा करते रहे और अन्त में महाराष्ट्र में पहुंचकर उन्होंने मुगलों के विरुद्ध फिर लड़ाई छेड़ दी। यह लड़ाई फिर तब तक समाप्त नहीं हुई जब तक कि मराठों ने सारी दिल्ली पर ही कब्जा नहीं कर लिया। अपना राज्य स्थापित करके शिवाजी ने बाकायदा अपना राज्याभिषेक किया। कहा जाता है कि बहुत – से ब्राह्मण पण्डितों ने उनका अभिषेक कराने से इंकार कर दिया था, किन्तु अन्त में एक ब्राह्मण पण्डित ने उनका राज्याभिषेक करवाया और वे छत्रपति शिवाजी के नाम से प्रसिद्ध हुए।

शिवाजी बहुत वीर और साहसी थे, यह तो उनकी विजयों और सफलताओं से ही स्पष्ट है। परन्तु उनका सबसे अधिक महत्त्व इस कारण है कि उन्होंने भारत में एक नई युद्धकला का प्रारम्भ किया। शिवाजी से पहले राजपूत लोग यह सम झते रहे थे कि युद्ध में पौउ दिखाना कायरता की निशानी है, इसलिए चाहे अपना बल कम और शत्रु का बल अधिक भी हो, तब भी युद्ध में लड़ते – लड़ते मर जाना ही सबसे बड़ी वीरता है। परन्तु शिवाजी ने इस बात को समझा कि युद्ध का अंतिम उद्देश्य विजय है ; वीरता – प्रदर्शन अपने आप में कोई उद्देश्य नहीं है।

इसलिए शत्रु को असावधान देखकर उसपर आक्रमण करना चाहिए, किन्तु यदि अपनी शक्ति उसकी अपेक्षा कम हो, तो युद्ध से पीछे हट जाना चाहिए और प्राक्रमण का नया प्रवत्तर खोजना चाहिए। यह छापामार युद्ध ही शिवाजी की सफलता का सबसे बड़ा कारण था। मुगलों की सेना जब शिवाजी से युद्ध करने चलती थी, तो शिवाजी की सेना कहीं दिखाई ही नहीं पड़ती थी। और फिर एकाएक रात के समय या किसी भी समय असावधान पाकर वह मुगलों पर हमला कर देती, रसद लूट लेती और फिर जैसे आंधी की तरह पाई थी, वैसे ही चली जाती।

शिवाजी केवल वीर योद्धा ही नहीं थे, अपितु कुशल शासक भी थे। उन्होंने राज्याभिषेक के बाद अपने शासन का काम बड़ी कुशलता से चलाया, जिसके कारण उनकी मृत्यु के बाद भी मराठा साम्राज्य अधिकाधिक शक्तिशाली होता चला गया। यदि शासन और संगठन की बुद्धि उनमें न होती, तो उनकी सफ लताएं उनकी मृत्यु के साथ ही समाप्त हो गई होती।

विशवाजी कला – प्रेमी और कला – पारखी भी थे। हिन्दी के प्रसिद्ध कवि भूषण शिवाजी के आश्रम में ही रहते थे और शिवाजी ने उनका बहुत सम्मान किया था। भूषण की कविताओं को पढ़ने से यह स्पष्ट हो जाता है कि औरंगजेब द्वारा हिंदुओं पर किए जाने वाले अत्याचारों का विरोध करने के लिए ही शिवाजी लड़ रहे थे। अपना निजी साम्राज्य बढ़ाने की उनकी इच्छा चाहे जितनी प्रबल रही हो, किन्तु मुगलों के विरोध से हिन्दू शक्ति को बलवान बनाना भी उनका बड़ा उद्देश्य था और इस उद्देश्य में उनको सफलता मिली।

केबल वीरता और रण – कौशल के कारण शिवाजी को सफलता नहीं मिली, अपितु वह उच्च कोटि के कूटनीतिज्ञ भी थे। पौरंगजेब उनके विरुद्ध जिन हिन्दू राजाओं को सड़ने के लिए भेजता था, उन्हें वह अंशतः अपनी पोर मिला लेते थे। उनके गुप्तचर शत्रु की हर गति – विधि का समाचार उन तक पहुंचाते थे।

सारा महा राष्ट्र प्रदेश मुगलों के लिए परदेश था और वहां के सभी निवासी प्रसन्नता से शिशजी के लिए गुप्तचर का काम करने को उद्यत रहते थे। साधारण परिवार में उत्पन्न होकर बड़ा साम्राज्य स्थापित करने वाले वीर योद्धा इतिहास में बहुत नहीं हुए। सिकन्दर, नेपोलियन और हिटलर के अतिरिक्त ऐसे सफल योद्धा कम ही हुए होंगे, जिनकी तुलना शिवाजी के साथ की जा सके।

शिवाजी की सफलता का महत्व इसलिए और भी अधिक हो जाता है, कि उन्होंने जिन शक्तियों से लोहा लिया वे कोई दुर्बल या पिछड़ी हुई सैनिक शक्तियां नहीं थौं, अपितु वे उस समय के संसार की सबसे बड़ी और उन्नत शक्तियां थीं। इसी लिए शिवाजी का नाम भारतीय इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखा जाता है।

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