चिड़ियाघर की सैर पर निबंध विद्यार्थियों के लिए | essay on zoo visit in hindi

दोस्तों में आज में आपके लिए चिड़ियाघर की सैर पर निबंध | essay on zoo visit in hindi लेके आया हु जैसे आप अपने स्कूल के काम और अपने परीक्षा के तैयारी में लिख सकते है तो चलिए पढ़ते है essay on zoo visit in hindi.

चिड़ियाघर की सैर पर निबंध विद्यार्थियों के लिए | essay on zoo visit in hindi

चिड़ियाघर की सैर पर निबंध | essay on zoo visit in hindi

वैसे तो सभी शहरों में देखने लायक अनेकानेक वस्तुएं होती हैं,परन्तु यदि कहीं चिड़ियाघर हो,तो उसकी तुलना में और सभी दर्शनीय वस्तुएं फीकी पड़ जाती हैं। मुझे चिड़ियाघर देखने का विशेष रूप से चाव है और अब तक मैं भारत चिडियाघर की सैर के लगभग सभी बड़े – बड़े चिड़ियाघरों को देख चुका हूं। फिर भी इन्हें देख – देख कर मेरा मन अभी भी भरा नहीं है।

वैसे तो चिड़ियाघर का अर्थ है,जहां चिड़ियां रखी गई हों,परन्तु चिड़िया घरों में केवल अद्भुत पक्षी ही नहीं रखे जाते,अपितु बनों में विचरण करने वाले पशु,सर्प और नदियों में रहने वाले प्राणी भी रखे जाते हैं। इसलिए नाम से केवल चिड़ियों का घर होने पर भी चिडियाघर सभी विचित्र प्राणियों का संग्र हालय होता है। अभी कुछ दिन पहले ही हन कई मित्र मिलकर चिड़ियाघर देखने गए थे।

चिड़ियाघर के अन्दर घुसते ही बाई ओर एक छोटा – सा होज बना हुआ था,जिस के ऊपर लोहे का नंगला लगा हुआ था। पानी के अन्दर नेवले जैसे कुछ प्रारणी तैर रहे थे। ये ऊदबिलाव थे। यदि पानी में कोई आदमी पैसा या इकन्नी डालता था,तो ये दुवको लगाकर उसे चट से निकाल लाते थे और हौज के अन्दर की ओर बने हुए एक छोटे – से पाले में रख देते थे। कुछ थोड़ा और आगे बढ़ने पर बन्दरों के कठघरे थे,जिनमें तरह – तरह के बन्दर बैठे हुए थे। इनमें से कुछ बन्दर तो बहुत बड़े – बड़े और बदसूरत थे। कुछ छोटे – छोटे और सुन्दर थे।

कुछ लंगूर भी थे। लोग इन बन्दरों के सामने चने डाल रहे थे,जिन्हें वे बड़े चाव से खा रहे थे। बच्चों और वन्दरों में कुछ समा नता थी,इसीलिए माता – पिता के रोकते – रोकते भी बच्चे बन्दरों को छेड़ देते थे और बदले में बन्दर भी उन्हें बुकियां दे रहे थे। और आगे बढ़ने पर एक बहुत बड़ा बाड़ा दिखाई पड़ा। इस बाड़े के चारों ओर जालियां लगी हुई थी और अंदर हिरन थे।

कुछ हिरन बैठे हुए जुगाली कर रहे थे ; कुछ इधर – उधर टहल रहे थे ; कोई – कोई बाहे के पास आकर दर्शकों के पास खड़े हो जाते थे। ये हिरन भी कई प्रकार के थे। कोई वारहसिंगा था,तो कोई चीतल था। किसीके सींग लम्बे – लम्बे थे,तो किसीके छोटे – छोटे। एक जगह हिरनों के छोटे – छोटे बच्चे भी थे,जो दर्शकों को देखते ही कुलांचे भरते हुए दूर भाग जाते थे। आगे दाई ओर को मुड़ने पर एक बड़ा – सा चौड़ा गड्ढा था,जिसके अंदर दो तीन पेड़ भी खड़े थे। गड्डे की दीवारें ऊंची और सीधी खड़ी थीं।

इनके ऊपर लोहे की नुकीली सलाखों की बाड़ लगी हुई थी। गड्ढे के अन्दर झांककर देखा,तो तीन चार भालू खेल में मस्त थे। भालुओं को इस तरह रखने का यह प्रबन्ध मैंने पहली बार देखा था। दूसरे चिड़ियाघरों में भालू छोटे – छोटे पिंजड़ों या क : घरों में रख्ने देखे थे। किन्तु यहां तो ये भालू खूब खुले उछल – कूद कर रहे थे। कभी वे एक दूसरे से कुश्ती लड़ने लगते और कभी पेड़ के ऊपर चढ़ जाते थे।

लोग भालुओं के लिए मूंगफलियां फेंक रहे थे। भालू उन्हें छिलके समेत चवाकर खा जाते थे और ऐसी दृष्टि से ताकने लगते थे,जैसे और मांग रहे हों। थोड़ा और आगे चलने पर छोटी – छोटी जालियों से बने हुए ऊंचे – ऊंचे कठघरे थे,जिनमें तरह – तरह के पक्षी चहचहा रहे थे। एक ओर एक सफेद मोर था। ऐसा मोर मैंने पहले कभी नहीं देखा था। लम्बी – लम्बी पूंछों वाले विचित्र तोते थे। सुन्दर कबूतर थे।

कई छोटी – छोटी चिड़ियां थीं,ऐसी जैसी कि हमने पहले कभी नहीं देखी थीं। एक पिंजड़े में कोयल थी। एक में कुछ बुलबुले थीं। एक में उल्लू बैठा हुआ था,जिसकी आखें दिन के प्रकाश के कारण झपी – सी जा रही थीं। बाई ओर मुड़ने पर छोटे – छोटे कठघरे थे। इनमें से मांस की बदबू आ रही श्री। इन कठघरों में भेड़िये,गीदड़ और लोमड़ियां थीं। भेडिया देखने में मामूली कुत्ते से बहुत कुछ मिलता – जुलता था।

गीदड़ देखने में ही बहुत डरपोक लगता था और लोमड़ी की चालाकी उसके चेहरे पर ही लिखी – सी जान पड़ती थी। उनसे थोड़ा – सा मागे एक छोटी – सी जगह को जालियों से घेर दिया गया था। उसके अंदर सफेद खरगोण रखे गए थे। ये खरगोश देखने में बहुत प्यारे मालूम होते थे। वे कभी बैठकर घास कुतरने लगते थे और कभी उछल – उछलकर इधर उधर भागने लगते थे। इन खरगोशों के पास ही एक और जाली में सफेद चूहे रखे हुए थे,जिन्हें गिनी पिग भी कहते हैं।

ये सफेद चूहे खरगोशों से भी अधिक सुन्दर और प्यारे जान पड़ते थे। अब हमें मुड़कर थोड़ी दूर जाना पड़ा। यहां काफी बड़ी जगह को लोहे की ऊंची – ऊंची सलाखों से घेर दिया गया था। अन्दर की जगह काफी बड़ी थी। उसमें बांस के भी पे और जहां – तहां छोटे – छोटे कुंड बने हुए थे,जिनमें पानी भरा हुआ था। यहां कौन – सा पशु रखा गया होगा,यह देखने के लिए जब हमने निगाह दौड़ाई तो देखा कि वांस के कुज की छाया में एक विशालकाय बाघ पड़ा हुआ सो रहा है।

इससे पहले चिड़ियाघरों में मैंने बाप कठघरों में ही बन्द देखे थे,परन्तु यहां तो यह ऐसा दृश्य था जसे मैं जंगल में ही बाघ को देख रहा होऊ। इतना अवश्य था कि लोहे के सींखचों की सुरक्षा होने से यहां भय नहीं लग रहा था। चारों ओर घूमकर देखा तो और दो – तीन बाथ उस बनावटी जंगल में विश्राम कर रहे थे। एक वाघ वैठा हुआ था और बड़े व्यान से दूर एक ही दिशा में देख रहा था।

हमने उस ओर निगाह दौड़ाई,तो पता चला कि बाघ की दृष्टि दूर एक हिरन पर थी,जो अपने बाड़े में टहल रहा था। कुछ बाघ अपने कठघरों में बैठे थे। ये प्राणी कुछ ऐसे भयंकर होते हैं कि इनको पिंजड़े में बन्द देखकर भी शरीर में एक सिहरन – सी दौड़ जाती है। जब कभी वे मुह फाउते,तो उनकी जीभ और लम्बे – लम्बे दांत देखकर विनोद भी होता और कुछ भय भी लगता।

बाघों के पास ही सिंहों के पिजड़े भी थे। सिंह कहने को ही पशुओं का राजा है,पर भयानकता और शक्ति में बाघ से उसकी कोई बराबरी नहीं है। किन्तु उनकी प्राकृति अधिक प्रभावोत्पादक और तेजपूर्ण होती है। उसकी गर्दन के बाल उनकी शोभा को बढ़ाते हैं,जिनके कारण वह भयानक न लगकर सुन्दर अधिक लगता है। सिंह के पास ही सिंहनी भी बैठी थी।

यह देखने में बाघिन की अपेक्षा निश्चित रूप से अधिक सुन्दर थी। इसके शरीर पर धारियां नहीं थीं,किन्तु जब बह हिलती – जुलती या चलती थी तो ऐसा प्रतीत होता था जैसे उसका सारा शरीर रबड़ का बना हुआ है। इतनी लचक कम प्राणियों में ही देखने को मिलती है। इससे आगे के कठघरा में चीते थे। इन चौतों को न जाने क्या धुन थी कि वे एक क्षण के लिए भी शान्त नहीं बैठ रहे थे और लगातार अपने कवघरों में चक्कर लगाए जा रहे थे।

इनके शरीर पर वित्तियां पड़ी हुई थीं,जिनके कारण इन्हें चीता कहा जाता है। किन्तु पेट के नीचे का भाग एकदम सफेद था। यहां कठघरों में देखने पर ये अत्यन्त सुन्दर प्राणी जान पड़ते थे। इनकी चुस्ती,फुती और लचक देखकर इनके शरीर पर हाथ फेरने की इच्छा होती थी,किन्तु हमें यह पता था कि सुन्दर होने पर भी चीता कितना खतरनाक प्राणी होता है।

एक ओर कुछ दूर हटकर एक गड्ढे में एक बड़े – से अजगर सांप को रखा गया था। इस गड्ढे के चारों ओर लोहे की सलाखें इस डंग से और इतने पास पास लगाई गई थीं कि उनमें से होकर अजगर बाहर न निकल सके। हम जितनी देर लाड़े रहे उतनी देर वह कुंडली मारे बैठा रहा,इसलिए उसे चलते हुए देखने का आनन्द हम न पा सके।

अब हम दाई पोर मुहकर कुछ दूर निकल गए। यहां हमने एक विचित्र पशु देखा। वह जमीन पर खड़ा – खड़ा एक ऊंचे वृक्ष की पत्तियां खा रहा था। उसके शरीर पर विचित्र चित्रकारी हुई थी। उसके सींग छोटे – छोटे थे,किन्तु गर्दन इतनी लम्बी थी कि इससे पहले हमने किसी प्राणी को न देखी थी। यह जिराफ था जो अफ्रीका के जंगलों में पाया जाता है। इसकी गर्दन ऊंट से भी लम्बी और पतली थी। ऊंचाई की दृष्टि से ऊंट इसके सामने बौना जान पड़ता था।

उससे अगले बारे में कुछ गवे जैसे प्राणी चर रहे थे,किन्तु अन्तर इतना था कि वे सफेद या काले नहीं में,अपितु उनके शरीर पर काली – काली पट्टियों जैसी धारियां पड़ी हुई थीं। ये जेबरे थें। ये भी अफ्रीका में ही पाए जाते हैं और घोड़ों और गधों की तरह घासाहारी पशु हैं। इसी कतार में अगले बाड़े में कंगारू थे। कंगारू प्रास्ट्रेलिया का एक विचित्र ही पशु है।

इसकी अगली टांगें छोटी थीं और पिछली टांगें ऊंची – ऊंची थीं। सबसे मनोरंजक बात यह थी कि इसके पेट के नीचे एक थैली थी,जिसमें यह अपने बच्चे को रख लेता है। इस समय कोई बच्चा उसके पास नहीं था। इसलिए हम बच्चे को इस थैली में बैठे हुए न देख सके। बिलकुल अलग एक ओर हटकर गैडे के लिए बाड़ा बनाया गया था। यह गैंडा हाल ही में आसाम के जंगलों से पकड़कर लाया गया था,इसलिए बहुत उपद्रवी था। लोगों को देखते ही यह उत्तेजित हो उठता था और भागने – दौड़ने लगता था।

ऐसा पशु प्रकृति में शायद और कोई नहीं है। इसकी यूध के ऊपर उगा हुपा सींग बहुत ही भयावना जान पड़ता था। मोटी खाल और परिपुष्ट शरीर को देखकर ही इसकी शक्ति का बहुत कुछ अनुमान हो जाता था। अब हम लगभग सारा चिड़ियाघर घून चुके थे। लौटते हुए एक ओर ऊंचे ऊंचे पिजड़े जैसे कमरे बने हुए थे। उथ उनके पास जाकर देखा,तो अन्दर आदमी से भी ऊंचे – ऊंचे पक्षी चलते हुए दिखाई पड़े। पता चला कि यह धातुरमुर्ग है।

सच मुच ही यह पक्षी देखने में ऊंट से कम नहीं जान पड़ता था,इसलिए जिन्होंने इसे उपक्षी नाम दिया,उन्होंने ठीक ही किया। देखने में बिल्कुल भोला – भाला और हानिरहित यह पक्षी रेगिस्तान में पोड़े से अधिक तेज दौड़ सकता है और चोंच और टांग की चोट से प्रादमी का भुर्ता बना सकता है।

अब चिड़ियाघर में देखने को और कुछ शेष नहीं था। मन में एक ही बात बार – बार उठती थी कि प्रकृति ने भी कैसे – कैसे विचित्र प्राणी संसार में उत्पन्न किए हैं। चिड़ियाघर को देखकर हम लौट आए,किन्तु उन पशु – पक्षियों की छाप मेरे मन पर अब तक भी अमिट बनी हुई है।

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