धर्म और विज्ञान पर निबंध दोनों में कौन महान

धर्म और विज्ञान पर निबंध दोनों में कौन महान

धर्म और विज्ञान पर निबंध

आजकल दिनोंदिन धर्म का प्रभाव क्षीण और क्षीण होता जा रहा है और विज्ञान का प्रभाव दिनोंदिन बढ़ रहा है। किन्तु कुछ समय पूर्व स्थिति इससे ठीक उल्टी थी। लगभग २५० वर्ष पहले जीवन के सभी क्षेत्रों में धर्म का आधि पत्त्य छाया हुआ था और विज्ञानवेत्ताओं को अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था। ऐसा समझा जाने लगा था कि वैज्ञानिक अनुसंधान धर्मग्रन्थों की शिक्षाओं के प्रतिकूल है और विज्ञान से नास्तिकता को प्रोत्साहन मिलता है।

इसलिए प्रभावशाली धर्मगुरुओं ने विज्ञानवेत्ताओं के विरुद्ध जिहाद – सा बोला हुआ था और कुछ विज्ञानवेत्ताओं को तो अपने प्राणों से भी हाथ धोना पड़ा था। अब तक भी धर्म और विज्ञान का वह विरोध पूरी तरह समाप्त हुआ नहीं दीखता। वस्तुतः शांत भाव से देखा जाए, तो धर्म और विज्ञान दोनों ने ही मानव जाति की उन्नति में योग दिया है।

भौतिक पक्ष की उन्नति विज्ञान के कारण हुई है, तो मानसिक और पात्मिक उन्नति का श्रेय धर्म को ही है। पता नहीं, पशुओं का भी काम केवल भौतिक आवश्यकताओं के पूर्ण हो जाने से चल सकता, है या नहीं, किंतु मनुष्य का काम तो निश्चित ही नहीं चल सकता।

उसके लिए भौतिक सुख – सुविधाओं की जितनी आवश्यकता है, उतनी हो, अपितु उससे भी कुछ अधिक मानसिक और आध्यात्मिक शान्ति और आनन्द की है। इसलिए मानव जगत् में धर्म और विज्ञान दोनों का महत्त्व सदा रहा है और प्रागे भी शायद बना रहेगा। यह बात दूसरी है कि किसी काल – विशेष की परिस्थितियों के कारण कभी एक का प्रभाव घट जाए और कभी दूसरे का। हमें पहले धर्म के स्वरूप को समझना चाहिए।

धर्म मानव – मन की एक उच्च भावना है। इसके द्वारा मनुष्य में सहानुभूति, सेवा, परोपकार प्रादि की भावनाएं जागरित होती हैं। धर्म के लिए सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, अस्तेय और अपरिग्रह जैसे अच्छे गुणों का अभ्यास और काम, क्रोध, लोभ, मोह जैसे दुर्गुणों का त्याग आवश्यक माना गया है। धार्मिक मनुष्य को भौतिक सुखों की ओर आकृष्ट न होकर कष्ट सहन का अभ्यास करना चाहिए।

अच्छे कर्म करने चाहिए। सत्य पर दृढ़ रहना चाहिए, चाहे उसके लिए कितना ही कष्ट सहन क्यों न करना पड़े। धार्मिक मनुष्य की दृष्टि में जीवन का अन्त इसी संसार में नहीं हो जाता, अपितु मर जाने के बाद भी आत्मा रहती है और वह दूसरे जन्म लेकर अच्छे कर्मों के कारण सुख और बुरे कर्मों के कारण दुःख पाती है। जो लोग पुनर्जन्म को नहीं मानते, वे भी परलोक, स्वर्ग और नरक को मानते हैं।

इसलिए वे सोचते हैं कि इस संसार के छोटे से जीवन में सुख भोग करने की अपेक्षा परलोक के लम्बे जीवन के लिए पुण्य – संचय करना चाहिए। लगभग सभी धर्मों में ईश्वर की सत्ता भी स्वीकार की गई है, जो भले लोगों को सहायक और दुष्टों को दंड देने वाला है। धार्मिक मनुष्य को ईश्वर पर विश्वास रखकर ठीक रास्ते पर चलते जाना चाहिए।

उसकी सारी विघ्न बाधाएं दूर हो जाएंगी और उसे सफलता अवश्य मिलेगी। ये सब षिक्षाएं और प्रादेषा बहुत अच्छे हैं। इनसे संसार का बहुत लाभ हुआ है और हजारों – लाखों जीवन इनके फलस्वरूप सुधर गए हैं। कितने ही सन्त महात्मानों ने अपना जीवन धर्म के कार्यों में उत्सर्ग कर दिया और दीन – दुखियों के दुःखों को दूर करना ही अपना लक्ष्य बना लिया।

उनके निर्मल और पवित्र जीवन से और भी कितने ही पथभ्रष्ट लोगों को प्रकाश दिखाई दिया। कितने ही दुष्ट और हिंस्र मनुष्य उनके पवित्र प्रभाव में आकर सुधर गए। ऐसे त्यागी, तपस्वी, सन्त लोगों के प्रति लोगों को श्रद्धा होनी स्वाभाविक थी। बड़े – बड़े धनाधीशों ने उनकी सेवा के लिए मठ और मन्दिर बनवाए।

उनकी सुख – सुविधा के लिए साम नियां जुटाई और सन्त – महात्माओं के कार्यों को सुचारू रूप से चलाने के लिए जो – जो भी सहायता प्रावश्यक थी, वह सब उनके भक्तों ने प्रदान की। इसीलिए धर्म का प्रभाव संसार के कोने – कोने में छा गया। बड़े – बड़े तीयों और नगरों का तो कहना ही क्या, छोटे – छोटे गांवों तक में धर्म – मन्दिर बन गए। किन्तु कालान्तर में धर्म का रूप विकृत होने लगा।

चरम उत्कर्ष तक पहुंचने के बाद पतन प्रारम्भ हुआ। सच्चे महात्माओं की सेवा के लिए जो मठ और मन्दिर बनाए गए थे, उनमें सुख और सुविधाओं के लोभ से डोंगी, पाखंडी लोग आ भरे। त्याग और सेवा की भावनाएं समाप्त हो गई। मठों की सम्पत्ति का उपयोग मठों के महन्त अपने विलास के लिए करने लगे।

अपनी दुर्बलताओं को छिपाने के लिए उन्होंने तरह – तरह के पाखंड और आडम्बर रचे। जनता को प्रकाश का मार्ग दिखाने की बजाय उन्होंने उसे अज्ञान के अंधकार में जुबाए रखना अधिक भला समझा। इस प्रकार किसी समय जो धर्म उच्च भावनाओं से प्रेरित और समाज की उन्नति का साधन था, वह रूप बिगड़ जाने पर समाज के पत्तन का कारण बन चला। ईश्वर के बजाय भूत – प्रेतों की पूजा होने लगी।

शुभ कार्य करके स्वर्ग पाने का प्रयत्न करने के बजाय पुरोहित और मठाधीश धन लेकर लोगों को स्वर्ग में सुविधाएं दिलाने का वचन देने लगे। बड़े से बड़े पाप का प्रायश्चित्त धन देने से होने लगा। यह थी अन्धविश्वास और अन्य श्रद्धा की चरम सीमा। जिस प्रकार धर्म की उन्नति स्थिर न रह सकी, उसी प्रकार धर्म की अवनति के ये क्षण भी मनुष्य को देर तक भुला रखने में असमर्थ हुए। उस समय विज्ञान ने सिर उठाना शुरू किया।

विज्ञान की मूल प्रवृत्ति तर्क और प्रत्यक्ष दर्शन के बाद ही विश्वास करने की थी। या तो कोई बात तर्क द्वारा समझ आ जाए या आंखों से देखी जा सके, उसीपर विश्वास किया जा सकता है। केवल किसी धर्मपुस्तक में लिखें होने या किसी धर्म गुरु द्वारा कही गई होने के कारण विज्ञान किसी बात को सत्य स्वीकार नहीं कर सकता। विज्ञान का तर्क धर्म द्वारा प्रचारित श्रद्धा का ठीक विरोधी पड़ता था, इसी लिए धर्म और विज्ञान में विरोध उठ खड़ा हुआ।

धर्म की आड़ में जो स्वार्थी लोग अपना उल्लू सीधा कर रहे थे, उनके हितों को विज्ञान से पांच पहुंचती थी, इस लिए उन्होंने वैज्ञानिकों के रास्ते में रोड़े अटकाना और उन्हें तरह – तरह से कष्ट देना प्रारम्भ किया। किन्तु सत्य का रथ पथ की विघ्न – बाधाओं से कभी रुका नहीं। जब एक बार धर्म के पाखंडों की पोल खुल गई, तो लोग प्राणों की बाजी लगाकर सत्य की खोज में जुट गए। अन्धविश्वास और अन्धश्रद्धा का विशाल गढ़ देखते – देखते धराशायी हो गया।

धर्म के ठेकेदार अपनी कल्पना के स्वर्ग में जिन सुखों की आशा दिलाते थे, उन्हें विज्ञान ने अपनी खोजों से इसी संसार में प्रस्तुत कर दिखाया। धर्म परमेश्वर की पूजा कर रहा था। विज्ञान ने प्रकृति की पूरा की। उसने वायु, जल, अग्नि, विद्युत् आदिशक्तियों को अपने वश में किया और उनसे अनेक प्रकार के काम लेकर मनुष्य के जीवन को सुखी और समृद्ध बना दिया। विज्ञान ने मनुष्य को इतनी शक्ति दी कि वह जल में, वायु में या समुद्र के गर्भ में इच्छानुसार जहां चाहे घूम सके। विज्ञान की सफलता ठोस और प्रत्यक्ष थी।

उसके मुकाबले में धर्म की स्वर्ग और नरक की कल्पनाएं धुंधली पड़ गई और उनपर से लोगों का विश्वास उठ गया। विज्ञान ने मनुष्य को एक वस्तु दी है और वह है – तर्कबुद्धि। विज्ञान का एक ही दावा है और वह यह कि वह केवल उसी वस्तु पर विश्वास करेगा जिसे वह प्रत्यक्ष कर सके। ‘ प्रत्यक्ष कर सकें ‘ का अर्थ यह नहीं है कि उसे प्रांखों से देखा जा सके अपितु यह है कि उसे बुद्धि द्वारा समझा जा सके और अपने उपकरणों द्वारा नापा – तोला जा सके।

यद्यपि आज तक किसी भी विज्ञानवेत्ता ने परमाणु को देखा नहीं है, फिर भी उन्होंने परमाणु की लम्बाई – चौड़ाई को नाप लिया है, उसका बोझ तोल लिया है और अपने उपकरणों से उसे फाड़कर उससे अपार कर्जा उत्पन्न कर दिखाई है। इससे स्पष्ट है कि आंखों से न देख पाने पर भी वस्तु का प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है।

तर्क – बुद्धि जगाकर विज्ञान ने मनुष्य की अन्ध श्रद्धा को दूर कर दिया है। जिस प्रकार धर्म का रूप विकृत हुआ और धर्म पाखंड और आडम्बरों में परि वर्तित हो गया, उसी प्रकार विज्ञान का रूप भी विकृत हो गया।

जिस विज्ञान ने मनुष्य की सुख – सुविधा के लिए रेलगाड़ी, विमान, विजली, रेडियो आदि साधन जुटाए थे, उसीने विनाशकारी विस्फोटक, तोपें, टैंक और परमाणु बम जैसे शस्त्रास्त्र भी जुटा दिए। जो विज्ञान मनुष्य की आकांक्षा की वस्तु था, वही परमाणु – आयुधों किन्तु दोनों के सहयोग से मानव – जाति निरन्तर सुख, समृद्धि और शांति की ओर बढ़ती चली जा सकती है।

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