भारतीय संविधान पर निबंध हिंदी में (essay on indian constitution in hindi)

essay on indian constitution in hindi हम भारत के लोग भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्वसम्पन्न लोकतंत्रात्मक गरण राज्य बनाने तथा उसके समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतन्त्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त कराने तथा उन सबमें व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता सुरक्षित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए दृढ़ संकल्प होकर अपनी इस विधान सभा में आज २६ जनवरी, १६४६ को एतद्द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मर्पित करते हैं।

‘ यह है भारतीय संविधान की प्रस्तावना, और इसमें संक्षेप में सारे संविधान के मूल तत्व आ जाते हैं। इसमें न केवल बिना किसी भेद – भाव के सब नागरिकों की समानता स्वीकार की गई है, अपितु सबको सामाजिक, आर्थिक तथा अभि व्यक्ति की स्वतंत्रता भी प्रदान की गई है। भारत का यह संविधान भारत की संविधान सभा ने तीन वर्ष के परिश्रम से तैयार किया था।

यह संविधान २६ जनवरी, १ ९ ५० से सारे देश में लागू कर दिया गया और तभी से २६ जनवरी को ‘ गणतंत्र दिवस ‘ घोषित किया गया। इस संवि धान को बनाने का श्रेय डा ० भीमराव अम्बेडकर, गोपालस्वामी अयंगर, अल्लादी कृष्णस्वामी अय्यर और कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी इत्यादि को है।

भारतीय संविधान पर निबंध हिंदी में (essay on indian constitution in hindi)

भारतीय संविधान पर निबंध हिंदी में

भारत का संविधान संसार के लिखित संविधानों में सबसे बड़ा है। यह संवि धान कोई एकाएक तैयार नहीं हो गया। भारत की स्वाधीनता की लड़ाई के समय ब्रिटिश सरकार ने भारतीयों को बढ़ती हुई आजादी की इच्छा को पूरा करने के लिए 1633 में एक विधान तैयार किया था, जिसका नाम ‘ भारत सरकार अधिनियम 1935 था | इस विधान में भारत के लिए एक संघीय शासन की व्यवस्था की गई थी।

यह विधान भारत में लागू भी कर दिया गया था और इसके अनुसार १६३७ में देश के विभिन्न प्रांतों में चुनाव भी हुए थे। किंतु 1636 में द्वितीय महायुद्ध छिड़ जाने के कारण इस विधान को स्थगित कर दिया गया। युद्ध १ ९ ४५ में समाप्त हो गया और १५ अगस्त, १६४७ को अंगेज़ों ने भारत को स्वतन्त्र कर दिया।

उसके बाद उसी १६३५ के भारत सरकार अधिनियम में कुछ हेर – फेर करके वर्तमान संविधान तैयार किया गया है। बीच – बीच में इस संविधान में कुछ संशोधन और परिवर्तन भी हुए हैं। वर्त मान दशा में संविधान के अनुसार भारत दो प्रकार के राज्यों में बंटा हुआ है। एक तो वे राज्य हैं, जिन्हें ‘ क ‘ श्रेरणी का राज्य कहा जाता है। इनमें शासन का अध्यक्ष राज्यपाल होता है।

राज्यों का पुनर्गठन होने बाद इन राज्यों की संख्या सोलह हो गई है। पुरानी सब रियासतें समाप्त करके उनको इन राज्यों में ही मिला दिया गया है। दूसरे प्रकार के राज्य ‘ ग ‘ श्रेणी के राज्य हैं, जिनका शासन चीफ कमि इनरों या लॅफ्टिनेंट गवर्नरों के हाथ में है। ये राज्य केन्द्रीय सरकार द्वारा शासित प्रदेश समझे जाते हैं। ‘ क ‘ श्रेणी के राज्यों में तो विधान सभाएं हैं ही, ‘ ग ‘ श्रेणी के भी कुछ राज्यों में विधान – सभाएं हैं।

शासन की दृष्टि से कुछ विषय केन्द्र को सौंप दिए गए हैं और कुछ राज्यों को। जिन विषयों का सम्बंध सारे देश से है, वे केन्द्र के हाथ में रखे गए हैं। ये विषय सातवीं अनुसूची की प्रथम सूची में गिनाए गए हैं, जिसे संघीय सूची भी कहा जाता है। जिन विषयों में राज्यों को कानून बनाने के पूर्ण अधिकार प्राप्त हैं, वे विषय सातवीं अनुसूची की दूसरी सूची में गिनाए गए हैं, जिसे राज्य सूची कहा जाता है।

कुछ विषय ऐसे भी हैं, जिनमें राज्यों की विधान सभाएं और केन्द्रीय संसद दोनों ही कानून बना सकते हैं। इसे सम्मिलित सूची कहा जाता है और यह सातवीं अनुसूची की तीसरी सूची है। जहां केन्द्र द्वारा बनाए गए कानूनों का राज्य द्वारा बनाए गए कानूनों से विरोध हो, वहां केन्द्र द्वारा बनाए गए कानून ” प्रामाणिक समझे जाएंगे। मोटे तौर पर सेना, मुद्रा, डाक, तार, विदेश नीति, रेडियो श्रादि विषय केन्द्र के हाथ में हैं।

दूसरी ओर शिक्षा, पुलिस, स्वास्थ्य, कृषि, सिंचाई आदि विषय राज्यों के पास हैं। भारत प्रजातंत्रीय गणतंत्र घोषित किया गया है। यह संघात्मक राज्य है। प्रजातंत्र की भी हमारे यहां संसदीय प्रणाली अपनाई गई है, जो इंग्लैंड में प्रचलित। अमेरिका वाली राष्ट्रपति प्रधान प्रणाली को नहीं अपनाया गया। (आगे भी पढ़ते रहिये – essay on indian constitution in hindi)

संसदीय प्रणाली में, जिस राजनीतिक दल का संसद में बहुमत होता है, उसका नेता प्रधान मंत्री चुना जाता है और वह अपना मंत्रिमंडल बनाता है। मंत्रिमंडल संयुक्त रूप में संसद के सम्मुख उत्तरदायी होता है। इसी प्रकार राज्यों की विधान सभाओं में भी मुख्य मंत्री चुने जाते हैं, जो अपना मंत्रिमंडल बनाते हैं और वे मंत्रिमंडल भी विधान- सभाओं के सम्मुख उत्तरदायी होते हैं।

राज्यों की विधानसभाओं और केन्द्र की संसद के सदस्यों का चुनाव जनता ही करती है। केन्द्र में विधान बनाने वाली सर्वोच्च संस्था संसद है। संसद के दो भाग हैं – एक लोकसभा और दूसरा राज्यसभा | लोकसभा निचला सदन है और राज्यसभा ऊपरला सदन। वास्तविक शक्ति लोकसभा के हाथ में है। लोकसभा के सदस्य पांच सौ और राज्यसभा के सदस्य प्रढ़ाई सौ होते हैं।

वैधानिक दृष्टि से भारत का सर्वोच्च पदाधिकारी राष्ट्रपति है। न केवल सारे देश का प्रशासन उसके हाथ में है, अपितु सशस्त्र सेनाओं का सर्वोच्च सेनापति भी वही है। भारतीय संविधान में प्रत्येक वयस्क नर – नारी को वोट का अधिकार दिया गया है। कहा जाता है कि जितने बड़े पैमाने पर भारत में प्रजातंत्रीय चुनाव होते हैं, उतने संसार के अन्य किसी भी देश में नहीं होते।

वोट के अधिकार के अतिरिक्त सब नागरिकों को समानता का अधिकार दिया गया है। जाति या धर्म के आधार पर या रंग लिंग के आधार पर किसी भी स्त्री या पुरुष के साथ किसी प्रकार का भेद – भाव नहीं किया जाएगा। पहले भारत में सामाजिक विषमता फैली हुई थी। छुआछूत के कारण बहुत से लोगों की दशा पहले बड़ी दयनीय थी।

किन्तु अब संविधान द्वारा अस्पृश्यता को दंडनीय अपराध घोषित कर दिया गया है। इसी प्रकार स्त्रियों की दशा भी बहुत कुछ शोषित वर्ग की सी थी। अब उनको भी पुरुषों के समान ही उन्नति के अवसर दिए गए हैं। इस संविधान में ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न करने की ओर विशेष ध्यान रखा गया है, जिनमें मनुष्य के व्यक्तित्व का विकास हो सके।

व्यक्तित्व का विकास स्वतंत्रता में ही हो सकता है, इसलिए सब लोगों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी गई है। यह स्वतन्त्रता उस सीमा तक है, जहां तक कि वह दूसरे नागरिकों की भावनाओं को चोट न पहुंचाए या विभिन्न वर्गों में द्वेष फैलाकर अशान्ति का कारण न बने। EE इस संविधान में पहले से चली आ रही पूंजीवादी व्यवस्था को ही स्वीकार कर लिया गया है।

सब व्यक्तियों को कानून सम्मत उपायों से सम्पत्ति अर्जित करने और उसे रखने का अधिकार दिया गया है और राज्य यदि कभी व्यक्ति की सम्पत्ति छीनेगा, तो उसका समुचित मुआवजा देगा | न्याय की दृष्टि से सब लोगों को समान घोषित किया गया है। न्याय विभाग को प्रशासन से पृथक् रखा गया है और न्याय की व्यवस्था के लिए सर्वोच्च न्याया लय की स्थापना की गई है।

सर्वोच्च न्यायालय महत्त्वपूर्ण मुकद्दमों की अंतिम अपीलें सुनता है और कानून के उलझे हुए प्रश्नों पर अपना निर्णय देता है। इस संविधान में आवश्यकतानुसार संशोधन या परिवर्तन किए जा सकते हैं, किन्तु इसके लिए संसद के दोनों सदनों के उपस्थित सदस्यों में से दो तिहाई के मत प्राप्त होने चाहिएं। इससे कम मत प्राप्त होने पर संशोधन स्वीकृत नहीं हो सकता।

आवश्यकता पड़ने पर राष्ट्रपति किसी राज्य में संकटकालीन स्थिति की घोषणा करके वहां का शासन – भार अपने हाथ में ले सकता है और उतनी देर के लिए वहां की प्रजातंत्रीय प्रणाली स्थगित समझी जाएगी। राष्ट्रपति का शासन छह महीने तक जारी रह सकता है। राष्ट्रपति का चुनाव जनता द्वारा प्रत्यक्ष न होकर परोक्ष होता है। केन्द्रीय संसद तथा राज्यों के विधान – मंडलों के सदस्य मिलकर राष्ट्रपति का चुनाव करते हैं और राष्ट्रपति पांच वर्ष के लिए चुना जाता है। भारत को धर्म निरपेक्ष राज्य घोषित किया गया है।

भारत में अनेक धर्मों और सम्प्रदायों के अनुयायी रहते हैं, किन्तु राज्य को धर्म से कोई सरोकार नहीं है। फ्रांसीसी क्रांति के प्रसिद्ध नारे स्वाधीनता, समानता और बन्धुत्व को भारतीय संविधान में भी प्रमुखता दी गई है। परिगणित जातियों के लिए दस वर्ष तक कुछ रियायतें दी गई हैं, जिससे वे अपनी शताब्दियों से गिरी हुई अवस्था को कुछ सुधार सकें और समाज के अन्य वर्गों के समकक्ष हो जाएं।

दस वर्ष बाद ये रियायतें समाप्त हो जाएंगी। प्रजातन्त्रीय देशों में भारत के संविधान की बहुत प्रशंसा की गई है। जिन आदर्शों को लेकर यह संविधान खड़ा हुआ है, उनके विरोध में कुछ भी नहीं कहा जा सकता | जितनी अल्प अवधि में यह संविधान तैयार करके लागू कर दिया गया, वह भी कम आश्चर्यजनक नहीं है। परन्तु बहुत से लोग संविधान के प्रलोचक भी हैं।

उनका कथन है कि यह संविधान पहले तो विधान निर्माताओं की कोई नई सूझ नहीं है, १६३३ के विधान को ही काट – छांटकर नया संविधान बना दिया गया है ; फिर अनेक देशों के संविधानों में से कुछ कुछ बातें लेकर इसे अच्छा खासा भानमती का पिटारा बना दिया गया है। भारतीय संविधान की सबसे बड़ी विशेषता इसका वयस्क मताधिकार कही जाती है।

इतने बड़े पैमाने पर वोट का अधिकार शायद संसार के किसी देश में नहीं है। परन्तु यह विचारणीय है कि भारत जैसे प्रशिक्षित देश में ऐसा मताधिकार लाभदायक है या हानिकारक | आमतौर से प्रशिक्षित लोग अपने वोट का दुरु पयोग ही करते हैं। समाजवादी लोग इस संविधान की इस आधार पर भी आलो चना करते हैं कि यह पूंजीवाद को बढ़ावा देता है।

राष्ट्रपति को संकटकालीन स्थिति की घोषणा करके किसी भी राज्य का शासन – सूत्र अपने हाथ में लेने का जो अधिकार दिया गया है, उसे भी बहुत से विचारक प्रजातन्त्र की भावना के प्रतिकूल बताते हैं और इसे अधिनायकतावाद की प्रवृत्ति का द्योतक कहते हैं। किन्तु निष्पक्ष दृष्टि से देखा जाए तो प्रजातंत्रात्मक प्रणाली के समर्थन की दृष्टि से भारत का संविधान एक प्रशंसनीय संविधान है।

भले ही इसमें कोई क्रांति – कारी कदम नहीं उठाया गया, किन्तु स्वाधीनता के प्रथम चरण में यदि शान्ति और व्यवस्था को बनाए रखकर उन्नति की ओर धीमी चाल से भी बढ़ा जा सके, तो वह भी कम सफलता नहीं है। इससे भी बड़े संतोष की बात यह है कि संविधान में संशोधन और परिवर्तन की पूरी गुंजाइश रखी गई है और जब जनता अनुभव करेगी, तब इसमें यथोचित संशोधन कर सकेगी।

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