भारत की शिक्षा व्यवस्था पर निबंध – indian education system in hindi

भारत की शिक्षा व्यवस्था पर निबंध (indian education system)

भारत की शिक्षा – प्रणाली बहुत प्राचीन काल में भारत सारे संसार में शान और विद्या का केन्द्र था । संसार के दूर – दूर के प्रदेशों से लोग विद्या प्राप्त करने के लिए भारत में आया करते थे । संसार की सबसे प्राचीन पुस्तक ऋग्वेद की रचना भी भारत में ही हुई थी । मौर्यकाल में तक्षशिला संसार का सबसे बड़ा और सबसे प्रसिद्ध विश्व विद्यालय था ।

उसके बाद भी गुत काल में नालन्दा और विक्रमशिसा की ख्याति न केवल इस देश में , अपितु विदेशों में भी थी और शिक्षार्थी लोग अनेक विघ्न बाधाओं को सहते हुए वहां पाते थे । भारत से भी अनेक विद्वान् ; उपदेशक और प्रचारक दूसरे देशों में जाया करते थे । जब से भारत पर विदेशी शकों और हूणों के अाक्रमण होने शुरू हुए , तभी से देश में राजनीतिक शक्ति के ह्रास के साथ – साथ विद्या का भी ह्रास होने लगा ।

विद्या और लक्ष्मी , दोनों का विकास शान्तिकाल में ही हो पाता है । पश्चिम की ओर से जब मुसलमान आक्रान्ता धीरे – धीरे भारत पर अपना आधिपत्य जमाने और बड़ाने लगे , तब भारत के विद्या – केन्द्र भी धीरे धीरे क्षीण होते चले गए । आक्रान्ता मुसलमान स्वयं प्रशिक्षित थे और उनमें धर्म का उन्माद बहुत अधिक था ।

इतिहास में लिखा है कि विजेता मुसलमानों ने अनेक पुस्तकालयों को जलाकर राख कर दिया । उस युग में , जबकि प्रेस नहीं थे और पुस्तकें बड़े परिश्रम से हाथ द्वारा लिखी जाती थीं , पुस्तकालयों की यह अति देश के लिए बहुत बड़ी थी । देश की विद्या और शिक्षा को जो धक्का उस समय लगा , उससे वह पूरी तरह सभी संभल नहीं पाया ।

प्राचीन काल में गुरु लोग अपने शिष्यों को शिक्षा दिया करते थे । गुरु का स्थान बहुत ऊंचा होता था और विद्यार्थी उनके पुत्रों की भांति ही उनके पाश्रम में रहकर पढ़ा करते थे । शिक्षा निःशुल्क होती थी । आगे चलकर जब बड़े – बड़े विश्व विद्यालय बने , तो उन विश्वविद्यालयों को भी राजाओं की ओर से बहुत बड़ी आर्थिक सहायता मिलती थी । न केवल धर्मग्रंथों की शिक्षा दी जाती थी , अपितु , आयुर्वेद और ज्योतिष की शिक्षा भी विद्यमान थी ।

किन्तु मुगल – काल में शिक्षा की कोई व्यवस्थित प्रणाली नहीं रही । जो थोड़ी – बहुत शिक्षा थी भी , वह केवल धर्म – ग्रन्थों के अध्ययन तक ही सीमित रही । उस समय आजकल की भांति पुस्तके सुलभ नहीं थी , इसलिए पढ़ने वाले लोगों की संख्या बहुत ही कम होती थी । अधिकांश लोग प्रशिक्षित रहकर ही अपनी जीविका – उपार्जन के कार्य में जुट जाते थे ।

अंग्रेजों का राज्य भारत में जमने के बाद भारतीय शिक्षा का एक नया अध्याय प्रारम्भ हुमा । अंग्रेजों ने यहां के लोगों को शिक्षा देना शुरू किया । उनके सामने एक स्पष्ट और निश्चित उद्देश्य था । वे यहां की बोली नहीं समझते थे , किन्तु देश उनके अधिकार में आ चुका था और उसपर उन्हें शासन करना था ।

इस लिए यह प्रावश्यक था कि वे कुछ लोगों को अपनी भाषा सिखा दें और उनके द्वारा देश के शासन का कार्य चलाएं । संक्षेप में , उन्होंने शिक्षा क्लर्क तैयार करने के लिए प्रारंभ की थी । इन बलकों को अंग्रेजी भाषा और दफ्तर में काम आने वाला गणित सीख लेना काफी था ।

इस प्रकार की शिक्षा का प्रचार देश में बहुत जल्दी हुआ , क्योंकि इस प्रकार की शिक्षा प्राप्त कर लेने पर नौकरी आसानी से मिल जाती थी , जो बहुत बड़ा प्रलोभन था । इस प्रकार की अंग्रेजी शिक्षा देने में अंग्रेज शासकों का एक और भी उद्देश्य यह था कि वे भारतीय संस्कृति और परम्पराओं को अपने देश की संस्कृति और परम्पराओं की तुलना में नीचा दिखा सकते थे ।

उन्होंने इतिहास और नागरिकशास्त्र इस ढंग से पढ़ाने शुरू किए , जिससे छात्रों पर यह प्रभाव पड़ता था कि अंग्रेजों के आगमन से पूर्व भारत में कोई अच्छी बात थी ही नहीं ; यहां के निवासी असभ्य और बर्बर थे ; और यह कि उनकी तुलना में इंग्लैंड का इतिहास बहुत अधिक उज्ज्वल है ।

इसका परिणाम यह होना स्वाभाविक ही था कि ऐसी शिक्षा – संस्थाओं से पढ़कर जो लोग स्नातक हों , वे अपने आपको अंग्रेज शासकों की तुलना में हीन समझे और उनके विनीत सेवक बने रहने में गर्व अनुभव करें । ज्यों – ज्यों देश में राजनीतिक चेतना बढ़नी शुरू हुई , त्यों – त्यों देगा के नेताओं का ध्यान इस राष्ट्रविरोधी शिक्षा के दोषों की ओर गया ।

उन्होंने देखा कि शिक्षा के नाम पर विद्यार्थियों को केवल अंग्रेजी लिखना और बोलना सिखाया जाता है । भारत की शिक्षा – प्रणाली me सब विषयों की पढ़ाई का माध्यम अंग्रेजी भाषा ही रखी गई थी और अंग्रेजी सीखने ही सीखने में विद्यार्थियों के इतने साल बीत जाते थे कि उसके माध्यम से बास्तविक ज्ञान प्राप्त करने का अवसर आ ही नहीं पाता था ।

इतना अवश्य हो जाता था कि अंग्रेजी पढ़ना और लिखना सीख जाने के बाद शिक्षित हो जाने का दावा करने वाले ये लोग अंग्रेजी डंग की वेष – भूषा पहनना , अंग्रेजी रहन – नाहन की अधूरी – सी नकल करला और अंग्रेजी भाषा में अपने पूर्वजों को लोसना भली भांति सीख जाते थे । शुरू में इस तरह की शिक्षा बहुत सुलभ न होने पर भी बहुत दुर्लभ नहीं थी ।

किन्तु समय बीतने के साथ – साथ यह शिक्षा मंहगी होती गई और इसे प्राप्त कर पाना केवल शहर में रहने वाले लोगों के लिए ही सम्भव रह गया । गांव में रहने वाले विद्यार्थियों के लिए केवल एक उपाय था कि यदि वे शिक्षा प्राप्त करना चाहते हैं तो शहर में आकर रहें । इन दोषों को देखते हुए अनेक सामाजिक और राजनीतिक नेताओं ने शिक्षा प्रणाली में सुधार के प्रयत्न किए ।

महात्मा मुंशीराम ने , जिनका नाम बाद में स्वामी श्रद्धानन्द प्रसिद्ध हुआ , सन् १८६० के आसपास गुरुकुल कांगड़ी की स्थापना की । इसमें उन्होंने दो वातों पर बल दिया । पहली बात यह कि विद्यार्थियों की शिक्षा अपने देश की भाषा अर्थात् हिन्दी के माध्यम से हो , सब विषय हिन्दी में पढ़ाए जाएं और दूसरी बात यह कि विद्यार्थियों में अपने देश के इतिहास और संस्कृति के प्रति गौरव का भाव जागाया जाए ।

इसके लिए गुरुकुल में संस्कृत साहित्य का अध्ययन अनिवार्य कर दिया गया । आज इन सिद्धान्तों को सारे देश में स्वीकार कर लिया गया है । जब तक पुराने इंग की अंग्रेजी शिक्षा पाने से लोगों को नौकरियां मिलती रहीं , तब तक तो वह प्रणाली दूषित होते हुए भी छात्रों को अपनी ओर आकृष्ट करती रही ।

किन्तु शीघ्र ही ऐसा समय आ गया , जब पड़े – लिखों की संख्या इतनी अधिक हो गई कि उन्हें नौकरियां दे पाना सरकार के लिए कठिन होया । इससे शिक्षित वर्ग में वेकारी फैल चली । उस शिक्षा में जीविका – उपार्जन का एकमात्र उपाय नौकरी ही रह जाता था । नौकरी न मिलने की दशा में बी ० ए ० पास व्यक्ति की दशा परकटे पंछी की – सी हो जाती थी

पढ़ – लिखकर मेहनत – मजदूरी करना अथवा अन्य किसी कला – कौशल द्वारा अपना निर्वाह कर पाना उनके बस का नहीं रहता था । इस बात की और महात्मा गांधी का ध्यान गया । उन्होंने देखा कि न केवल वह शिक्षा बहुत खर्चीली है , अपितु वह विद्यार्थी को पंगु भी बना देती है । उसका आत्मविश्वास छीन लेती है ।

इसलिए गांधीजी ने अपनी एक नई बर्षा शिक्षा योजना बनाई , जिसे बाद में ‘ बुनियादी तालीम ‘ या ‘ वेसिक शिक्षा ‘ नाम दिया गया । बैंसिक शिक्षा का आधारभूत सिद्धान्त यह है कि शिक्षा केवल किताबी न होनी चाहिए , अपितु उसका जीवन के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध होना चाहिए । छात्र जिन परिस्थि तियों में रहता है और जिस बातावरण में उसे अपना जीवन बिताना है , उसीके आधार पर उसे शिक्षा दी जानी चाहिए ।

साथ ही पढ़ाई के साथ – साथ कोई न कोई उद्योग – धन्धा , शिल्प या कला – कौशल भी सिखाया जाना चाहिए , जिसके द्वारा पड़ाई समाप्त करने के बाद विद्यार्थी अपनी जीविका भी कमा सके । कला – कौशल की शिक्षा देने में एक यह भी उद्देश्य था कि इससे शिक्षा सस्ती हो जाएगी । शिक्षा पर होने वाला व्यय बहुत कुछ उन उद्योग – धन्धों और कला – कौशल द्वारा तैयार की गई वस्तुषों से ही निकल आएगा ।

स्वाधीनता प्राप्त होने से पहले ही देश के शिक्षाशास्त्रियों ने इस बात को स्वीकार कर लिया था कि वासक को शिक्षा उसकी मातृभाषा के माध्यम से ही दी जानी चाहिए । विदेशी भाषा का बोझ विद्यार्थी के सिर पर लादना उसके ज्ञान प्राप्त करने के मार्ग में रोड़े अटकाना है । बहुत समय तक शिक्षा के उद्देश्य के संबन्ध में लोगों के मन में भ्रांति बनी रही और अब तक बनी हुई है ।

विक्षाशास्त्री तो इस बात को समझते हैं कि शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति के मन का विकास करना है ; शिक्षा मनुष्य की बुद्धि को प्रखर करती है और उसके ज्ञान – क्षेत्र का विस्तार करती है । उसे निर्भय और पात्म – निर्भर बनाती है । किन्तु अधिकांश छात्र और छात्राओं के अभिभावक शिक्षा का एकमात्र उद्देश्य यह समझते हैं कि शिक्षा पाकर व्यक्ति नौकरी करके धन कमाने लायक बन सके ।

वस्तुतः सचाई यह है कि शिक्षा ऐसी होनी चाहिए , जो एक ओर मनुष्य के मन का विकास भी करे और दूसरी ओर अपनी आजीविका कमाकर उसे अपने पैरों पर खड़ा होने में समर्थ भी बनाए । इसीलिए आजकल कला और साहित्य की शिक्षा के साथ – साथ आजीवों ( पेशों ) के प्रशिक्षण को भी शिक्षा का अनिवार्य मंग माना जाने लगा है ।

देश के स्वाधीन होने के बाद देश की शिक्षा प्रणाली को सुधारने के लिए बहुत कुछ प्रयास किया गया है । शिक्षा प्रणाली में विद्यमान दोषों को बारीकी से छान बीन करने और उन्हें दूर करने के उपाय सुझाने के लिए अनेक समितियों और आयोगों की स्थापना की जा चुकी है और उनकी सिफारिशों पर अमल किया गया है ।

आजकल की शिक्षा में प्रमुख दोष ये हैं : शिक्षा महंगी है । सामान्य व्यक्ति अपने बालक को उच्च शिक्षा नहीं दिला सकता । विद्यार्थियों का ध्यान पढ़ाई की ओर कम और हुल्लडबाजी की और अधिक रहता है । विद्यालयों में छुट्टियां बहुत होती हैं , जिससे विद्यार्थियों का ध्यान पड़ाई की ओर केन्द्रित नहीं हो पाता ।

अध्यापकों और छात्रों के बीच सम्बन्ध बहुत शिथिल है । छान अध्यापकों का यथो चित सम्मान नहीं करते । छात्रों में अनुशासन की बहुत कमी है । वे न केवल परी क्षाओं में नकल करते या हड़ताल करते देखे जाते हैं , बल्कि अनेक बार अध्यापकों पर हाथ उठाते भी पाए जाते हैं । कुछ घटनाएं तो छात्रों द्वारा अध्यापकों के कल्ल तक की भी हो चुकी हैं ।

आजकल की शिक्षा प्रणाली भी अत्यन्त दूषित है , जिसमें विद्यार्थी के वर्ष भर के अध्ययन पर पूरा ध्यान नहीं दिया जाता , बल्कि वर्ष के अन्त में एक परोक्षा लेकर ३३ प्रतिशत अंक लेने वाले विद्यार्थी को भी उत्तीर्ण घोषित कर दिया जाता है । इन सब दोषों को हटाने के लिए प्रयत्न किया जा रहा है । सबसे पहला प्रयत्न तो अध्यापकों की दशा सुधारने के लिए किया गया है ।

अध्यापकों के वेतनत्रम बड़ाए गए हैं , जिससे उन्हें अपने गौरव को गिराने वाली ट्यूशनों का धन्धा न करना पड़े । वेतन वृद्धि के अतिरिक्त राष्ट्रपति द्वारा सम्मान दिलाकर भी अध्या पकों का मान बढ़ाने का यत्न किया जा रहा है । प्रारम्भिक शिक्षा निःशुल्क कर दी गई है और एक निश्चित आयु के बालक और बालिक मों के लिए पढ़ाई अनिवार्य कर देने का प्रयत्न किया जा रहा है ।

जो लोग नौकरी करते हुए भी और ऊंची शिक्षा पाना चाहते हैं , उनके लिए सायंकालीन महाविद्यालय खोले जा रहे हैं । ऐसे विद्यालय भी खोले जाने की योजना है , जहां प्रशिक्षित मजदूर शाम को पाकर शिक्षा प्राप्त कर सकें । यह बात भी सिद्धान्त – रूप में स्वीकार कर ली गई है कि प्रारम्भिक शिक्षा मातृभाषा या हिन्दी में होनी चाहिए और किसी भी विदेशी भाषा का बोझ छठी श्रेणी से पहले विद्यार्थी पर न डाला जाए ।

देश की सारी जनता को शिक्षित करने की समस्या एक बड़ी समस्या है । इसका हल वस्तुतः तभी हो सकता है , जब अधिकतम योग्यता वाले व्यक्ति शिक्षा क्षेत्र में प्राना पसन्द करें ।

वह तभी हो सकता है , जब शिक्षा – क्षेत्र में अध्यापकों को अन्य क्षेत्रों के बराबर ही वेतन मिलने लगे । हमारी सरकार ने इस बात को भली भांति अनुभव कर लिया है और वह शिक्षा प्रणाली के सर्वांगीण सुधार के लिए कटिबद्ध है । क्योंकि प्रजातन्त्र देश का निर्वाह तब तक नहीं हो सकता , जब तक कि उसके सभी नागरिक भली भांति शिक्षित न हों ।

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