देशभक्ति पर निबंध | Essay on patriotism in Hindi

Essay on patriotism in Hindi हेलो दोस्तों आप सभी का मेरे इस ब्लॉग पर स्वागत है में आज आपके लिए देशभक्ति पर निबंध/देश प्रेम पर निबंध जिसमे हम इस सभी विषय को पड़ेंगे जैसे की देश से प्रेम करने से आप क्या समझते हैं, देश सेवा आपके लिए कितनी महत्वपूर्ण है और कैसे हम अपने देश की सेवा कर सकते। तो चलिए बिना किसी देरी के शुरू करते है।

देशभक्ति पर निबंध | Essay on patriotism in Hindi

देशभक्ति पर निबंध | Essay on patriotism in Hindi

जिस देश में हमने जन्म लिया और जहां मिलकर हम बड़े हुए हैं, उसके प्रति प्रेम या अनुराग होना बिलकुल स्वाभाविक है। जिस प्रकार मनुष्य को अपने परि बार से, माता, पिता, भाई, बहन, स्त्री, पुत्र आदि से प्रेम होता है, उसी प्रकार साथ रहते – रहते अपने पड़ोसियों से भी प्रेम हो जाता है और यही प्रेम का भाव जब और अधिक उदार और विकसित हो जाता है, तो मनुष्य अपने सभी देशवासियों को अपना भाई या मित्र समझ लेता है और उनसे प्रेम करता है। ‘ जननी जन्म भूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी ‘ का यही अर्थ है कि मां और जन्मभूमि स्वर्ग से भी अधिक सुख देने वाली हैं।

देशभक्ति मन की एक उच्च भावना है। यह हमें देश के प्रति अपना सर्वस्व बलिदान करने के लिए प्रेरित करती है। देश की विदेशी प्राक्रमण से रक्षा करने के लिए अथवा देश की दशा को सुधारने के लिए देशभक्त त्याग करते कभी नहीं हिचकिचाता। सच्चे देशभक्त की दृष्टि में देश की सेवा करना ही सबसे बड़ा कर्तव्य होता है।

पहले यह समझ लेना उचित होगा कि देश क्या है ? किसी भी बड़े भूभाग को हम देश कह सकते हैं ; किन्तु वहां के पहाड़, वहां की नदियां और वहां के वन ही देश का सब कुछ नहीं हैं ; उन वस्तुओं के प्रति तीव्र प्रेम होना ही देशभक्ति नहीं है, अपितु उस देश के निवासी देश का और भी महत्वपूर्ण अंग हैं। जैसे भूभाग के बिना केवल निवासी देश नहीं कहला सकते, उसी प्रकार निवासियों के बिना भी कोई भूभाग देश नहीं कहलाएगा, विशेष रूप से देशभक्त की दृष्टि में। देशभक्त के लिए तो भूभाग और उसके निवासी दोनों मिलकर ही देश हैं।

हमारी उन्नति या अवनति, हमारी समृद्धि या दुर्दशा, हमारे देश की दशाओं पर ही निर्भर है। जो लोग उन्नत देशों में जन्म लेते हैं, वे अधिक अच्छी शिक्षा पाते हैं, अधिक सुखी जीवन व्यतीत करते हैं। इसके विपरीत पिछड़े हुए असभ्य देशों के निवासी उन्नति की दौड़ में पीछे रहते हैं और जीवन का अधिकांश भाग कष्ट में बिताते हैं। इस संबंध में हमें दास – व्यापार के दिनों को नहीं भूलना चाहिए, जबकि यूरोप के लोग अफ्रीका के हब्दिायों को दासों के रूप में पकड़ ले जाते थे और उन्हें इस प्रकार बेच देते थे मानो वे पशु हों।

इसका कारण यही था कि यूरोप के देश शस्त्र – बल और शिक्षा की दृष्टि से उन्नत थे और वे अफ्रीका के निवासियों पर विजय पा सकते थे। इस उदाहरण का प्रयोजन केवल इतना है कि यदि हमारा देश उन्नत न हो और स्वाधीन न हो, तो हमारी दशा भी दासों जैसी हो सकती है ; और यदि हमारा देश उन्नत और समृद्ध हो, तो हम संसार में गौरव के साथ सिर ऊंचा करके खड़े हो सकते हैं। इसलिए देश के प्रत्येक निवासी का यह कर्तव्य हो जाता है कि वह अपने देश की दशा को सुधारने के लिए जो कुछ कर सकता है, अवश्य करे।

इस समय हमारे देश की जो भी स्थिति है, वह हमारे पूर्वजों के कार्यों का फल है। यदि कभी हमारा देश पराधीन हो गया था, तो उसका कारण यह था कि उससे पहले की पीड़ी ने देश के प्रति अपना कर्तव्य पूरी तरह नहीं निभाया। उसके बाद जब देश स्वाधीन हुआ, तो उसका अर्थ यह था कि उससे पहले की पीढ़ी ने देश को स्वाधीन कराने के लिए परिश्रम किया, बलिदान किया और संघर्ष किया।

आज हमारे ही नहीं, अपितु किसी भी देश की जो दशा है, वह अब से पहले की पीढ़ियों के कार्यों का परिणाम है और अब हम जो कुछ करेंगे, उसका परिणाम आगे आने वाली पीढ़ियों के सम्मुख पाएगा। जब कोई देश पराधीन होता है, तब उसको पराधीनता के चुंगल से छुड़ाने के लिए देशभक्ति की भावना को जगाना आवश्यक होता है। इसी प्रकार जब किसी स्वाधीन देश पर कोई दूसरा देश आक्रमण कर देता है, तब उस आक्रमण का मुका बला करने के लिए भी देशभक्ति की भावना को जागरित करना आवश्यक हो जाता है।

संसार का इतिहास ऐसे असंख्य उज्वल उदाहरणों से भरा पड़ा है, जिनमें लोगों ने अपने देश की स्वाधीनता की रक्षा के लिए हंसते – हंसते अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। ऐसे देशभक्त वीर प्रायः सभी देशों में और सभी कालों में होते रहे हैं। रूस, जापान, जर्मन, इंग्लैण्ड इत्यादि सभी देशों में देशभक्त वीरों को अत्यन्त गौरव का स्थान दिया गया है और उनकी कहानियों को बड़े प्रेम और आदर के साथ सुना जाता है।

हमारे भारतवर्ष में भी देशभक्तों की परम्परा बड़ी उज्वल रही है। चन्द्रगुप्त मौर्य के समय से भारत का ज्ञात इतिहास प्रारम्भ होता है। उस समय सिकन्दर के आक्रमण को रोकने के लिए छोटे – छोटे राजाओं ने जिस वीरता का परिचय दिया, वह भारत के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखे जाने योग्य है। उस वीरता का ही यह परिणाम था कि सिकन्दर व्यास नदी से आगे न बढ़ सका। चंद्रगुप्त मौर्य ने विदेशी प्रानान्ताओं को इस बुरी तरह अफगानिस्तान से परे खदेड दिया कि उन्होंने कई शताब्दियों तक इस ओर मुंह न किया।

उसके बाद भी पुष्य मित्र, समुद्रगुप्त, शालिवाहन और विक्रमादित्य आदि राजाओं ने देश को विदेशी आक्रांतामों से मुक्त कराने के लिए पोर युद्ध किए और सफलता प्राप्त की। मुगल काल में भी राणा प्रताप, शिवाजी, छत्रसाल और गुरु गोविन्दसिंह अत्याचारी शासन के विरुद्ध लड़ते रहे। अंग्गजों के राज्य – काल में १८५७ में लाखों वीरों ने देश को स्वाधीन कराने के लिए अपने प्राणों की बाजी लगा दी और उसके बाद भी स्वाधीनता की लड़ाई कभी उन और कभी मन्द रूप में १ ९ ४७ तक चलती रही।

अन्त में देश स्वाधीन होकर रहा। अनेक नवयुवक देश की स्वाधीनता के लिए जानते – बूझते हंसते – हंसते फांसी पर झूल गए या गोलियों के सामने छाती खोलकर वीरगति को प्राप्त हुए। देश की स्वाधीनता मिल जाने से यह नहीं समझना चाहिए कि अब देशभक्ति को प्रावश्यकता नहीं रही या अब देशभवतों के करने के लिए कुछ कार्य शेष नहीं है।

वस्तुतः ऐसा समय कभी नहीं आ सकता, जबकि देशभक्त के करने के लिए कुछ शोष न रहे ; क्योंकि देशभक्त का कार्य केवल विदेशी शासन या आक्रमण के विरुद्ध लड़ना ही नहीं है, अपितु देश की दशा सुधारने के लिए प्रशिक्षा, गरीबी और सामाजिक विषमता के विरुद्ध लड़ना भी है। सभी देशों में सदा कुछ न कुछ त्रुटियां पौर अभाव अवश्य होते हैं, जिन्हें दूर करने के लिए देशभक्त कार्य कर सकता है।

पिछली आधी पाताब्दी में देशभक्ति का अर्थ यह समझा जाने लगा था कि अपने देश की उन्नति के लिए प्रयास किया जाए ; पड़ोसी देशों को जीतकर अपने अधीन किया जाए और इस प्रकार अपने देवा का गौरव बढ़ाया जाए। यहां तक कि कुछ देशों ने तो विश्व – विजय करने के मनसूबे भी बांधे थे। परन्तु गत दो विश्व बुद्धों ने इस बात को स्पष्ट कर दिया है कि यह देशभक्ति का बिगड़ा हुआ रूप है।

दूसरे देशों को अपने अधीन करके उनका शोषण करना मानव – मन की उच्च भावना नहीं कही जा सकती, जबकि देशभक्ति एक बहुत उच्च भावना का नाम है। अब वे दिन लद गए प्रतीत होते हैं कि जब बड़े राष्ट्र छोटे राहों को जीतकर उन पर शासन किया करते थे। इसलिए अब देशभक्ति का अर्थ भी ठीक – ठीक समझा जाना चाहिए।

देशभक्ति का प्रयोग रचनात्मक कार्यों के लिए होना चाहिए, विनाशात्मक कार्यों के लिए नहीं। देशभक्त को यदि कभी युद्ध करना ही हो, तो वह अपनी स्वतन्त्रता की प्राप्ति अथवा रक्षा के लिए करना चाहिए। दूसरों की स्वाधीनता के अपहरण के लिए कदापि नहीं। सच्चे देशभक्त को देश के लिए पात्मबलिदान करना पड़ता है।

उसे अपने व्यक्तिगत हानि – लाभ की परवाह न करते हुए देश के हित के लिए अपनी संपूर्ण शक्ति लगा देनी पड़ती है। ऐसा बलिदान कभी व्यर्थ नहीं जाता और किसी भी देश के निवासी ऐसे कृतघ्न नहीं होते कि वे ऐसे वलिदान का आदर न करें। सभी देशों में सच्चे देशभक्तों की पूजा होती है। परन्तु आजकल बहुत – से लोग अपना उल्लू सीधा करने के लिए देश – सेवा का ढोंग रचते हैं।

चुनाव लड़ते हैं और उच्च पद पाने के लिए लालायित रहते हैं। ऐसे स्वार्थी लोगों में और सच्चे देवाभक्तों में अन्तर शिक्षा नहीं रहता। स्वार्थी लोगों का लोग केवल उस समय तक पादर करते हैं, जब तक उनके हाथ में सत्ता रहती है। किन्तु सच्चे देशभक्तों का आदर सत्ता न रहने पर भी होता है और उनकी मृत्यु के पश्चात् भी होता है।

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