भाखड़ा नांगल की यात्रा पर निबध | Essay on the Journey of Bhakra Nangal

भाखड़ा नांगल की यात्रा पर निबध | Essay on the Journey of Bhakra Nangal

भाखड़ा नांगल की यात्रा पर निबध

दुनिया के सबसे ऊंचे बांध के रूप में भाखड़ा का नाम मैं बहुत दिन से सुन रहा था, इसलिए इसे देखने की इच्छा मन में तीव्र और तीव्रतर होती जा रही थी। किन्तु जाने का कोई सुयोग नहीं बन रहा था। एक दिन जब मैंने सुना कि हमारे कार्यालय के कर्मचारियों की ओर से एक दल भाखड़ा और नांगल घूमने के लिए जा रहा है, तो मैंने भी बड़े उत्साह के साथ उस दल में अपना नाम लिखवा दिया और इस प्रकार मेरी बहुत दिन से अपूर्ण इच्छा को पूरा होने का अवसर मिला।

कार्यक्रम यह था कि एक बस तीसरे पहर ३ बजे हमारे कार्यालय पर आ जाएगी। सब लोग अपना सामान लेकर वहीं पहुंच जाएंगे। ठीक साढ़े तीन बजे बस रवाना हो जाएगी। पहली रात अम्बाला में बिताकर अगले दिन शाम नांगल पहुंच जाएंगे। उस दिन नांगल का बांध देखेंगे और अगले दिन भाखड़ा जाकर वहां का बांध देखकर दोपहर को चण्डीगढ़ पहुंच जाएंगे। रात चंडीगढ़ में बिताने के बाद अगले दिन दिल्ली वापस लौट आएंगे।

जब लगभग पौने चार बजे बस चली, उस समय आकाश में अच्छी धूप थी और वर्षा की कोई संभावना नहीं दीख पड़ती थी। यद्यपि बस उन्हीं रास्तों पर से होती हुई जा रही थी जिनपर से हम लोग प्रायः नित्य ही गुज़रते हैं, परन्तु इस समय यात्रा की मनोदशा में होने के कारण वे रास्ते भी हमको कुछ नये – से लग रहे थे। आधे घंटे तक बस दिल्ली शहर की भीड़ – भाड़ में ही चलती रही। जब शहर समास हो गया और सड़क के दोनों ओर दूर – दूर तक खुला मैदान दिखाई देने लगा, तो मन में एक नया ही आनन्द भर उठा।

लगभग दो घंटे के बाद जब हम पानीपत पहुंचे, तो आकाश में बादल घिर पाए थे और हल्की – हल्की बूंदाबांदी शुरू हो गई थी। हमारे बिस्तर मोटर की छत पर थे। गीला हो जाने के डर से उन्हें उतारकर हमने अन्दर ही रख लिया और मोटर फिर आगे बढ़ने लगा। जब हम अम्बाला पहुंचे, तब काफी रात हो चुकी थी। हमारे ठहरने का प्रबंध पहले से ही हो चुका था, किंतु भोजन की व्यवस्था हमारे अपने साथ ही थी।

भोजन बनाने के लिए हम रसोइये और सब आवश्यक सामान साथ ले चल रहे थे। भोजन बनते और खाते रात के ग्यारह बज गए। यात्रा के कारण हल्की – सी थकान अनुभव हो रही थी, जिसके कारण खूब मीठी नींद आई। अगले दिन सवेरे उठकर थोड़ा – सा प्रातराश करके हम फिर बस में सवार हो गए और नांगल की ओर चल दिए। अम्बाला से चंडीगढ़ लगभग ४०-४५ मील दूर है। वहां हमारी बस थोड़ी देर के लिए रुकी और हमने दूर – दूर तक फैले हुए इस नये बनते हुए शहर पर एक उड़ती – सी नज़र डाली।

चंडीगढ़ पंजाब की राजधानी है और यह शहर अभी बनने की ही दशा में है। शहर नये नमूने पर बन रहा है। रास्ते में एक प्रसिद्ध दर्शनीय स्थान पड़ता है गुरुद्वारा आनंदपुर साहिब। हम सब इसे देखने गए। यह गुरुद्वारा एक ऊंची पहाड़ी के ऊपर बना हुआ है। किसी समय सिखों के दसवें गुरु गोविन्दसिंह यहां रहते थे और फर्रु खसियर आदि मुगल बादशाहों की फौजों से लोहा लिया करते थे। गुरुद्वारा एक छोटे – से दुर्ग के रूप में बना हुआ है और ऐसी जगह पर है, जहां से आने वाली सेना को मीलों दूर से ही देखा जा सकता है।

यह गुरुद्वारा सिख लोगों की दृष्टि में अत्यन्त पवित्र समझा जाता है। इसे केशगढ़ साहिब भी कहते हैं। इसका यह नाम इसलिए पड़ा है, क्योंकि गुरु तेगबहादुर का सिर इसी स्थान पर लाया गया था और यहीं उसकी अंत्येष्टि की गई थी। गुरुद्वारे में पुराने सिख वीरों के स्मारक के तौर पर कई अस्त्र – शस्त्र रखे हुए हैं। वहां के ग्रन्थी महोदय ने वे अस्त्र – शस्त्र हमें दिखाए और उनका संक्षेप में इतिहास भी बताया। यह स्थान देखने में बहुत सुन्दर है।

शिवालिक की पर्वतमाला इसके बिलकुल निकट से गुज़र रही है और यह पहाड़ी भी उसीका अंश – सा मालूम होती है। दाईं ओर दूर ऊंची पहाड़ी पर नैना देवी का मंदिर दिखाई पड़ रहा था, जो हिन्दुओं की दृष्टि में बहुत पवित्र माना जाता है। जो बादल आकाश में रात घिरे थे, वे अब तक भी फटे नहीं थे। यद्यपि वर्षा नहीं हुई थीं, फिर भी मौसम बहुत सुहावना हो उठा था और इस बादलों की छाया में शिवालिक की पर्वतमालाएं सांवली – सी पड़कर और भी सुन्दर हो उठी थीं।

दोपहर का भोजन हमें गंगुवाल पहुंचकर करना था। गंगुवाल में नंगल नहर के किनारे एक अच्छा डाक बंगला बना हुआ है। दोपहर का विश्राम हमने यहीं किया। जब तक भोजन तैयार हो, तब तक हम गंगुवाल का बिजलीघर देखने चले गए। बाहर से देखने पर यह विजलीघर मामूली – सा दीखता था। परंतु जब अंदर पहुंचे, तो आश्चर्य से अवाक् ही रह जाना पड़ा। चारमंज़िले मकान जितनी ऊंची ऊंची दो मशीनें पानी के ज़ोर से चल रही थीं, जिनसे बिजली पैदा हो रही थी।

कैसे इतनी बड़ी – बड़ी मशीनें यहां लगाई गई होंगी ! और इनके चलाने और देख भाल के लिए जो विचित्र प्रबंध किए गए हैं, उनको पूरा – पूरा न समझ पाने पर भी इतना अवश्य समझ में आ गया कि यह सब कुछ बहुत ही बड़ा काम है। इनमें से एक – एक मशीन २४००० किलोवाट बिजली पैदा कर रही थी। यह बिजलीघर नगल नहर पर बनाया गया है, जो अपने ढंग की भारत में नई नहर है। शाम होते – होते हम नांगल जा पहुंचे। नांगल में सतलुज नदी को रोककर उसमें से नंगल नहर निकाली गई है।

यहां पर एक बहुत बड़ा बांध बनाया गया है, जिससे सारी सतलुज नदी के पानी को काबू में कर लिया गया है और उसे इच्छानुसार नहर में या नदी में छोड़ा जा सकता है। इस बांध की एक और बड़ी विशेषता यह है कि नदी की ओर जमीन के अंदर ७० फुट की गहराई पर नदी के आर – पार एक सुरंग बनाई गई है। इस सुरंग में अंदर की ओर पानी रिसता रहता है, जिसे बिजली के पंपों द्वारा बाहर निकाल दिया जाता है, किंतु इस रिसते हुए पानी से इंजीनियर लोग यह अनुमान लगा लेते हैं कि बांध की रचना पर पानी का कितना दबाव पड़ रहा है और कहीं मरम्मत की तो आवश्यकता नहीं है।

नांगल छोटा – सा शहर है और यहां के लगभग सभी मकान सरकारी मकान हैं। यह सारी बस्ती ही सरकारी है। जो लोग दिन में भाखड़ा बांध पर काम करने जाते हैं, वे भी शाम को लौटकर यहीं वापस आ जाते हैं। सतलुज नदी के किनारे नये ढंग से बसा हुआ यह शहर बहुत ही प्यारा मालूम होता था। वैसे भी इन दिनों सब ओर बरसात ने हरियाली का मखमल बिछाया हुआ था, जो बादल घिरे होने के कारण गहरे हरे रंग का दिखाई पड़ता था।

रात होते ही नदी पर बने हुए बांध पर तेज रोशनी वाली बिजली की बत्तियां जगमगाने लगीं, जिनके प्रतिबिम्ब नदी के पानी में बहुत ही सुन्दर दीखने लगे। नहर की ओर नदी का पानी प्रपात के रूप में गिर रहा था, जिसके कारण ऊंची – ऊंची फुहारें उठ रही थीं और एक भारी – सी आवाज़ लगातार हो रही थी। रात होते – होते अच्छी वर्षा होने लगी, किन्तु हम लोग खा – पीकर आराम से सो गए। अगले दिन भी बादल फटे नहीं थे, किंतु वर्षा रुक गई थी।

हम बस पर चढ़कर भाखड़ा की ओर रवाना हुए। नांगल से भाखडा कोई दस मील है। वहां रेल भी जाती है और मोटर भी जा सकती है। रास्ता सतलुज के किनारे – किनारे ही चला गया है। यह पहाड़ी स्थान है और यहां मोटर चलाने में बहुत सावधानी बरतनी पड़ती है। जगह – जगह सूचना – पट्ट लगे हुए थे, जिनपर मोटर – चालकों को गाड़ी सावधानी से चलाने के लिए चेतावनियां लिखी हुई थीं। अभी हम भाखड़ा से दूर ही थे कि हमने सड़क से कुछ हटकर एक रखड़ का पट्टा चलता देखा। यह पट्टा मशीनों की सहायता से घूम रहा था।

पट्ट के ऊपर रेत और कंकड़ पड़े हुए थे, जो पट्टा घूमने के साथ – साथ तेज़ी से एक ओर को चले जा रहे थे। पता चला कि यह पट्टा साढ़े चार मील दूर से इसी तरह रोड़ियां और रेत ढोकर भाखड़ा के बांध तक पहुंचाता है। ढुलाई का यह सुविधाजनक और जल्दी काम करने वाला साधन है। इसे देखकर बहुत आश्चर्य हुआ। भाखड़ा में सतलुज नदी दो तंग पहाड़ियों में से होकर बह रही थी।

इंजीनियरों ने यह हिसाब लगाया कि यदि इस स्थान पर बांध बना दिया जाए, तो उससे अस्सी वर्ग मील की एक झील तैयार हो जाएगी, जिसमें वर्षा का पानी भर कर जमा होता रहेगा और उसी पानी को सदियों और गर्मियों में साल भर सिंचाई के काम में लाया जा सकेगा। इसी योजना को पूरा करने के लिए साढ़े सात सौ फुट ऊंचा यह बांध तैयार किया जा रहा है। बांध का अढ़ाई सौ फुट हिस्सा तो नींव के रूप में ज़मीन के अन्दर है और पांच सौ फुट ऊंचा बांध ज़मीन के ऊपर है।

अभी यह बांध पूरा नहीं बना था। चार सौ फुट ऊंचा बांध बनना अभी शेष था। फिर भी जितना कुछ काम वहां हो रहा था, उसे देखकर आश्चर्य ही होता था कि इन ऊंची – नीची पहाड़ियों में इतना सारा निर्माण कार्य कैसे हो रहा है ! सारी नदी को बांधकर एक बहुत छोटे – से स्थान में से बांध के ऊपर से गिराया जा रहा था। नदी का यह प्रपात बहुत ही नयनाभिराम था। वहां के सन्दर्शकों ने बतलाया कि यहां दो बिजलीघर बनाए जाएंगे, जिनसे नब्बे हजार किलोवाट बिजली पैदा होगी।

हमने पहाड़ पर ऊपर चढ़कर बांध के दोनों ओर देखा। बांध के दूसरी ओर जो झील बनती है, वह इस समय यद्यपि बहुत छोटी थी, फिर भी बड़ी भली मालूम हो रही थी। हमें बताया गया कि इस समय यह झील कुल बारह वर्ग मील की है। बांध पूरा बन जाने पर यह अस्सी वर्ग मील हो जाएगी। हमने उस दृश्य ‘ की मन ही मन कल्पना की और इसमें सन्देह न रहा कि जब यह झील पूरी बन जाएगी, तो सचमुच ही दर्शनीय होगी। काफी देर तक बांध और उसके आसपास की दूसरी रचनाओं को हम देखते रहे और सन्दर्शकों से बांध के बारे में जानकारी प्राप्त करते रहे। दोपहर के लगभग हम वापस लौट पड़े।

दोपहर का भोजन हमने नांगल में किया और उसके बाद रवाना होकर चंडीगढ़ जा पहुंचे। रात चंडीगढ़ में बिताई। अगले दिन सवेरे उठकर घूम – फिरकर चंडी गढ़ देखा। इतने विस्तृत शहर में घूमना – फिरना भी आसान काम नहीं है। सर कारी सचिवालय और उच्च न्यायालय के भवन प्रभावोत्पादक प्रतीत हुए। दोपहर को हम चंडीगढ़ से दिल्ली के लिए रवाना हो गए और शाम होते – होते दिल्ली पहुंच गए। ऐसा लगता है कि बादल हमारे दिल्ली पहुंचने की ही प्रतीक्षा कर रहे थे। क्योंकि दिल्ली पहुंचते ही मूसलाधार वर्षा शुरू हो गई।

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