हिमालय पर विजय निबंध | essay on victory over the Himalayas in hindi

हिमालय पर विजय निबंध | essay on victory over the Himalayas in hindi

हिमालय पर विजय निबंध

हिमालय की विजय के प्रयत्न बहुत पहले से चल रहे हैं। हिमालय के सर्वोच्च शिखर का नाम चौंगुलागामा है। इसपर चढ़ने की इच्छा साहसिक यात्रियों के मन में तभी से थी, जब से इस शिखर का पता चला था। चौंगुलागामा का अर्थ है – पर्वतों की रानी। इसी शिखर को माउण्ट ऐवरेस्ट भी कहते हैं। इसकी ऊंचाई २६१४१ फुट है। हिमालय का वर्णन। हिमालय की तराई, जिसमें घने जंगल हैं और तरह तरह के वनपशु रहते हैं।

उसके ऊपर पर्वतीय शिखर, जहां सुन्दर नगर बसे हुए हैं और सबसे ऊपर हिमाच्छादित चोटियां, जिनपर बर्फ कभी समाप्त ही नहीं होती। चौगुलागामा पर अभियान के लिए तिब्बत और नेपाल की सीमा में से गुजरना आवश्यक है। पहले पहल १ ९ २१ में तिब्बत सरकार ने चौंगुलागामा पर जाने के लिए एक दल को अनुमति दी। इस दल का नेता कर्नल हावर्ड बरी था।

यह दल १८००० फुट की ऊंचाई तक गया। वहां आधार – शिविर बनाकर ये लोग ५००० फुट और ऊपर चढ़ सके। किन्तु वहां से इन्हें वापस लौटना पड़ा। १६२२ में ब्रिगेडियर जनरल ब्रूस ने चौंगुलागामा पर चढ़ाई की, पर ब्रूस अधिक से अधिक २८१०० फुट की ऊंचाई तक चढ़ सका और वापस लौट आया।

दल के दो सदस्य ऐंड्रयू इरवाइन और ली – मैलौरी चौंगुलागामा पर चढ़ने गए, पर कभी वापस नहीं लौटे। १६३३, १६३५, १६३६ और १ ९ ३८ में भी कई यात्री – दल गए, किन्तु उनमें से किसीको विशेष सफलता न मिली। हिमालय पर चढ़ाई की कठिनाइयां। चौंगुलागामा पर चढ़ने के लिए पहले तो लगभग दो सौ मील का रास्ता तय करके पहाड़ की जड़ तक पहुंचना होता है।

यह रास्ता भी बहुत थका देने वाला है। इन ऊंचे शिखरों पर सर्दी बहुत पड़ती है। यहां चढ़ने के लिए विशेष कपड़े बनाए जाते हैं जो गर्म, हवारोक और साथ ही हल्के भी हां। हवा हल्की होने के कारण सांस फूलता है, थकान पाती है और वजन उठाना कठिन हो जाता है। जी मिचलाता है और वज़न घटने लगता है।

जगह – जगह कच्ची बर्फ का खतरा रहता है, जिसके कारण यात्री गहरे गड्ढों में गिर सकते हैं, जो शेरपा कुली मामूली पहाड़ों पर डेढ़ मन वजन उठाकर चल सकते हैं, वे इस ऊंचाई पर दस सेर से अधिक वजन नहीं उठा सकते। सन् १ ९ ५१ में ऐरिक शिप्टन ने नैपाल होकर चौंगुलागामा पर दक्षिण की ओर से चढ़ने के लिए एक नये मार्ग का पता लगाया।

१ ९ ५२ में एक स्विस यात्री दल के दो सदस्य रेमण्ड लैम्बर्ट और तेनसिंह नोरके २८२०० फुट की ऊंचाई तक चढ़ सके। १ ९ ५३ में कर्नल हंट के नेतृत्व में एक दल गया, जिसे चौंगुलागामा को विजय करने में सफलता प्राप्त हुई। उस दल के दो सदस्य तेनसिंह नोरके और ऐडमण्ड हिलेरी २६ मई को इस शिखर के ऊपर पहुंच गए, कर्नल हंट ने पुराने अनुभवों से फायदा उठाया था।

यह दल इतना सामान लेकर चला था कि उसे उठाने के लिए ३६२ कुली किए गए थे। औक्सीजन के नये और हल्के यन्त्र बनाए गए थे और सबसे बढ़कर इस दल के सदस्य दृढ़ सकल्प के साथ जा रहे थे। तेनसिंह नोरके तो जान पर खेलकर भी चौंगुलागामा पर पहुंचने के लिए बेचैन था। २५ मई को दल के दो सदस्य बोडिलोन और ईवान्स को चढ़ाई के लिए भेजा गया, पर वे २८२७० फुट की ऊंचाई तक पहुंचकर लौट पड़े।

२७ मई को तेनसिंह और हिलेरी को भेजा गया। २८ मई को सारे दिन हवा चलती रही। इसलिए ये दोनों तम्बू में पड़े रहे। २६ मई को इन्होंने चढ़ाई शुरू की। इनके यन्त्रों में ऑक्सीजन गैस बहुत कम रह गई थी। इसके सहारे जाना और लौट पाना सम्भव नहीं था। तभी इन्हें पहले दिन बोडिलोन और ईवान्स द्वारा फेंके हुए दो औक्सीजन – यन्त्र मिल गए, जिनसे इन्हें बड़ी सहायता मिली।

कठोर परिश्रम करते हुए ये दोनों शिखर के ऊपर जा पहुंचे और वहां तेनसिंह ने भारत, नैपाल और इंग्लैंड के झंडे फहरा दिए और हिलेरी ने उसका फोटो खींच लिया। मनुष्य की बुद्धि, साहस और संकल्प के सामने प्रकृति को हार माननी पड़ती है। साहसी लोगों का संसार में सम्मान होता है।

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