औद्योगिक प्रदर्शनी निबंध (Industrial exhibition essay in hindi)

Industrial exhibition essay in hindi – आज का हमरा विषय उधोग प्रदर्शनी पर निबंध हिंदी में जो आपके स्कूल वर्क के लिए और स्कूल की परीक्षा के लिए है. तो चलिए Industrial exhibition essay सुरु करते है।

औद्योगिक प्रदर्शनी निबंध (Industrial exhibition essay in hindi)

Industrial exhibition essay in hindi

मैंने पहले भी अनेक प्रदर्शनियां देखी हैं। 1955 में दिल्ली में हुई उद्योग प्रदर्शनी तो बहुत ही सुन्दर थी। उसके बाद दिल्ली में ही रेल – प्रदर्शनी हुई थी। 1958 में दिल्ली में भारत के प्रौद्योगिक विकास की एक प्रदर्शनी हुई, जिसमें सारे भारत की झलक दिखाई गई थी। यह प्रदर्शनी मुझे बहुत ही अच्छी लगी।

प्रदर्शनी में बिजली की रंग – बिरंगी बत्तियों की ऐसी भरमार थी कि पास पहुं चते ही प्रदर्शनी में मुसने से पहले ही ऐसा लगता जैसे इन्द्रपुरी में आ पहुंचे हों। दो बड़ीचड़ी सर्चलाइटों का प्रकार आकाश में छोड़ा जाता था, जो कई मील तक दिखाई पड़ता था।प्रदर्शनी के अन्दर घुसने पर तो हम अवाक् ही रह गए। सब ओर खूब सजी हुई और प्रकाश से दमकती हुई दूकानें थीं।

एक ओर किसी साइकिल कम्पनी का प्रदर्शन – कक्ष था, जहां एक नकली आदमी बैठा हुआ साइकिल चला रहा था। लोगों की सवारी के लिए भी कई साइकिलें बिजली से चलाई जाती थीं। कुछ और आगे बढ़ने पर चीनी मिट्टी के बर्तनों की दूकानें थीं। ऐसे सुन्दर चीनी मिट्टी के बर्तन हमने पहले कहीं नहीं देखे थे। रेशमी कपड़ों की दुकानें भी बहुत सुन्दर थी।

एक जगह जूट से तैयार होने वाले रस्सों, दरियों और कालीनों का प्रदर्शन था। इसी प्रकार अनेक बड़ी – बड़ी कम्पनियों ने अपने बनाए हुए सामान का प्रदर्शन किया हुआ था। इनके अतिरिक्त अलग – अलग राज्य – सरकारों ने अपने – अपने राज्य की विकास योजनाओं का प्रदर्शन किया था। कहां – कहां नदियों पर बांध बंध रहे हैं, उनसे कितनी नहरें निकलेंगी, कितनी बिजली पैदा होगी, ये सब बातें नमूने बनाकर और चार्ट बनाकर दिखाई गई थीं।

इसके अतिरिक्त कृषि के सुधार और शिक्षा के प्रसार के लिए बरते जा रहे उपायों का भी प्रदर्शन था। सभी राज्यों के प्रदर्शन – कक्ष बहुत सुन्दर बने हुए थे। राजस्थान के कक्ष के सामने तो एक पिजड़े में दो शेर के बच्चे भी रखे हुए थे। रक्षा मन्त्रालय का प्रदर्शन – कक्ष अलग था, जिसमें तरह – तरह के हथियार और दूसरा सामान दिखाया गया था। पास ही दो – तीन छोटे – छोटे विमान भी थे और पानी में चलने वाली नौकाएं भी थीं।

रेलवे मंत्रालय की ओर से रेल और इंजिनों के अलग – अलग भागों का प्रदर्शन किया गया था। यह प्रदर्शनी इतनी बड़ी थी कि यदि सारी प्रदर्शनी को देखा जाता, तो 27 मील चलना पड़ता। इसलिए हम केवल मुख्य – मुख्य भागों को ही देख पाए। प्रदर्शनी के अन्दर ही एक झील भी बनी हुई थी।

इसके बीच में भाखड़ा – नांगल के बांध का नमूना बहुत बड़ा और सुन्दर बनाया गया था और झील में नौकाएं चलाने का भी प्रबन्ध था। हमने नौका पर भी सवारी की। किंतु मुझे तो सबसे अधिक आनन्द उस भाग को देखकर आया, जिसमें तरह तरह के मनोरंजक खेल थे। एक बड़ा ऊंचा गोल झूला था। जब उसमें हम बैठे, तो बहुत ही आनंद पाया।

जब झूला ऊपर जाता था, तो सारी प्रदर्शनी एक दृष्टि में दिखाई पड़ती थी और जब भूला नीचे उतरता था, तो थोड़ा डर – सा लगता था। पर शीघ्र ही वह डर दूर हो गया। यहां और भी तरह – तरह के झूले थे। एक जगह अपनी शक्ति आजमाने के लिए मशीन लगी हुई थी। लोग वहां पैसे दे – देकर अपनी शक्ति – परीक्षा कर रहे थे।

जगह – जगह ऐसे कई खेल थे, जिनमें लोग निशाना लगा कर इनाम प्राप्त कर सकते थे। परन्तु मैंने किसीको इनाम पाते नहीं देखा। एक जगह एक विचित्र लड़की थी, जिसके शरीर से भाग निकलती थी। वह एक कुर्सी पर बैठ जाती थी और उसके पारीर को मशाल छुपाने से मशाल जल उठती थी। एक और लड़की थी, जिसका सिर तो लकड़ी का था, पर बाकी शरीर सांप का था।

वह आदमी की तरह बोलती थी। इसी प्रकार और भी अनेक विचित्र वस्तुएं देखकर हम अन्त में बहुत थक गए और कुछ लाने बैठे। यहां खाने – पीने की दूकानें तो बहुत बड़ी थीं, किंतु सामान बहुत गन्दा और मंहगा था। हमने यह सोचा कि अगर कभी प्रदर्शनी देखने जाना ही हो, तो कम से कम खाने का सामान अपने साथ लेकर जाना चाहिए।

जब मदर्शनी देखकर बाहर निकले, तो बस के अड्डे पर लंबी कतार लगी हुई थी, किंतु शीघ्र ही कई बसें आ गई और सारी कतार खत्म हो गई। हम मजे से घर लौट आए

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