कश्मीर की समस्या पर एक निबंध लिखिए | kasmir issue hindi essay

कश्मीर की समस्या पर एक निबंध लिखिए | kasmir issue hindi essay विस्तार में पढ़े। 

कश्मीर की समस्या पर एक निबंध लिखिए | kasmir issue hindi essay

कश्मीर समस्या पर एक निबंध लिखिए

सन् १ ९ ४७ में अंग्रेजों ने भारत को स्वाधीनता दे दी, किन्तु इसके साथ ही उन्होंने देश के दो टुकड़े कर दिए तथा भारत और पाकिस्तान में पारस्परिक वैमनस्य के ऐसे बीज बो दिए, जिनके कारण दोनों देश आज भी शान्ति से नहीं बैठ पा रहे हैं। भारत और पाकिस्तान के बीच जिन विवादों को लेकर तनाब है, उनमें काश्मीर की समस्या सबसे प्रमुख है।

जब भारत को स्वाधीन किया गया, तो अंग्रेजों द्वारा शासित प्रान्तों का बंटबारा तो भारत और पाकिस्तान के बीच में हो ही गया था, साथ ही देशी राज्यों को यह छूट दी गई थी कि वे भारत वा पाकिस्तान में से जिसके साथ चाहें, मिल जाएं। जो देशी राज्य भारत के या पाकिस्तान के बीच में पड़ते थे, उनके लिए तो यह छूट होना और न होना बराबर ही था, क्योंकि भारत के या पाकि स्तान के बीच में रहते हुए वे दूसरे देश के साथ गठबन्धन नहीं कर सकते थे।

परन्तु काश्मीर ऐसा राज्य था, जिसकी सीमा भारत और पाकिस्तान दोनों से छूती थी और वह दोनों में से किसीके भी साथ मिलने की घोषणा कर सकता था। समस्या इस कारण कुछ और भी अधिक उलझ गई थी कि काश्मीर का राजा तो हिन्दू था, किन्तु वहां की प्रजा का बहुत बड़ा भाग मुसलमान था। भारतीय स्वाधीनता – अधिनियम के अनुसार कानूनी रूप से राजा को यह चुनने का अधिकार था कि वह भारत या पाकिस्तान में से किसके साथ मिले।

किन्तु काश्मीर की सरकार ने दोनों देशों में से किसी के भी साथ न मिलकर दोनों से अलग रहने का निर्णय किया। स्वाधीनता से पहले भारत की राजनीति में काश्मीर और हैदराबाद दो राज्य एक दृष्टि से बराबर समझे जाते थे। हैदराबाद में प्रजा हिन्दू थी और राजा मुस लमान। काश्मीर में इसके विपरीत राजा हिन्दू था और प्रजा मुसलमान। पाकि स्तान सब मुसलमानों का संरक्षक होने का दावा करता था।

इसलिए जब उसने देखा कि हैदराबाद राज्य तो भारत के बीच में जा फंसा है और उसके सामने भारत में मिलने के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है, तो उसने काश्मीर पर बलपूर्वक कब्जा कर लेना चाहा। इसके लिए एक अस्थायी आजाद काश्मीर सरकार बनाई गई और उसकी अोर से हजारों कबाइलियों को सयास्त्र करके काश्मीर पर आक्रमण करने के लिए भेज दिया गया।

इन कबाइलियों को पाकि स्तानी सेना के शस्त्रास्त्र दिए गए और इनका नेतृत्व भी पाकिस्तान के सैनिक अफसरों ने किया। काश्मीर राज्य की सेना बहुत छोटी – सी थी। उसने बड़ी बीरतापूर्वक इन लुटेरों का मुकाबला किया, किन्तु संख्या में कम होने के कारण वह इन्हें रोक न सकी और कबाइली लोग तूफान की तरह बड़ते हुए कुछ ही दिनों में काश्मीर की राजधानी श्रीनगर के पास तक आ पहुंचे। उस समय काश्मीर की सरकार को होश आया।

उसे अपना अस्तित्व संकट में दिखाई पड़ा। वहां के राजा और काश्मीर के सबसे बड़े राजनीतिक दल नेशनल कान्फ्रेंस के नेता शेख अब्दुल्ला ने कबाइलियों के रोकने के लिए भारत से सैनिक सहायता मांगी। भारत सरकार ने कहा कि भारतीय सेनाएं काश्मीर की रक्षा के लिए तभी भेजी जा सकती हैं, जबकि काश्मीर सांविधानिक रूप से भारत में सम्मिलित हो जाए। काश्मीर के राजा और शेख अब्दुल्ला दोनों ने काश्मीर का भारत के साथ सम्मिलन स्वीकार कर लिया और उसके बाद अवि लम्ब विमानों द्वारा भारतीय सेना काश्मीर भेजी गई।

काश्मीर में भारतीय सेना ने जो कुछ किया, वह स्वर्णाक्षरों में लिखे जाने योग्य है। रुबाइली आक्रान्ता हवाई अड्डे के बिलकुल पास तक पहुंच चुके थे और यदि दो – एक घंटे का भी विलम्ब हो जाता, तो वे हवाई अड्डे पर अधिकार कर लेते और उस दशा में काश्मीर तक सैनिक सहायता भेज पाना लगभग असम्भव ही हो जाता। परन्तु मुट्ठी भर भारतीय सैनिकों ने आक्रमणकारियों को आगे बढ़ने से रोक दिया और ज्यों – ज्यों सेना की नई कुमुफ पहुंचती गई, त्यों – त्यों भारतीय सेना का बल बढ़ता गया और उसने भाकान्ताओं को बहुत दूर तक खदेड़ दिया।

यदि उस समय भारतीय सेना को कुछ और समय की छूट मिल जाती, तो सारे काश्मीर पर भारत का अधिकार हो जाता और यह समस्या कभी की हल हो गई होती। परन्तु तभी भारत सरकार ने काश्मीर पर पाकिस्तान के आक्रमण के प्रश्न को संयुक्त राष्ट्रसंघ की सुरक्षा परिषद् के सम्मुख प्रस्तुत कर दिया। सुरक्षा परिषद् ने चटपट दोनों देशों में युद्ध – विराम सन्धि करवा दी, जिसके फलस्वरूप काश्मीर का लगभग आधा भाग पाकिस्तान के अधिकार में रह गया और आधे भाग पर भारत का अधिकार है।

जहां तक कानूनी स्थिति का प्रश्न है, काश्मीर को उस समय की वैध सरकार ने काश्मीर को भारत में मिलाना स्वीकार किया था, इसलिए काश्मीरभारत का अंग बन चुका है। केबल राणा ने ही नहीं, अपितु वहां की प्रजा के नेताओं ने भी भारतीय सेनाओं को काश्मीर भेजने की मांग की थी और काश्मीर को भारत के साथ मिलाना स्वीकार किया था। इस प्रकार राजा और प्रजा दोनों की इच्छा से काश्मीर भारत का अंग बना है। पाकिस्तान के कबाइलियों या पाकिस्तानी सेनाओं का काश्मीर में प्रवेश केवल नग्न आक्रमण के सिवाय कुछ नहीं है।

काश्मीर पर कब्जा करने के लिए पाकिस्तान की एकमात्र युक्ति यह है कि काश्मीर की प्रजा का बड़ा भाग मुसलमान है और मुसलमानों की संस्कृति पाकि स्तान की संस्कृति से मिलती है। इसलिए काश्मीर को पाकिस्तान के साथ मिला दिया जाना चाहिए। किन्तु भारत इस साम्प्रदाविक युक्ति को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है। भारत में भी इस समय चार करोड़ मुसलमान रह रहे हैं।

इसलिए कोई कारण नहीं कि काश्मीर के मुसलमान भी भारत का अंग बनकर क्यों न रह सकें। काश्मीर का व्यापार भी पाकिस्तान की अपेक्षा भारत के साथ पहले से ही कहीं अधिक होता रहा है। संयुक्त राष्ट्रसंघ में काश्मीर के प्रश्न को ले जाने से कोई लाभ नहीं हुआ। पाकिस्तान को आक्रान्ता घोषित किया जाना चाहिए था, किन्तु वैसा न करके अन्य कई नये – नये विवाद खड़े कर दिए गए और सारा प्रश्न अभी तक ज्यों का त्यों अनिर्णीत ही पड़ा हुआ है।

इसका कारण यह है कि संयुक्त राष्ट्रसंघ में राजनीतिक गुटबन्दी है और गुटबन्दियों के फलस्वरूप किसी प्रश्न परपूरी निष्प क्षता के साथ निर्णय नहीं हो पाता। युद्ध – विराम – सन्धि के समय भारत के राजनीतिक नेताओं ने यह घोषणा कर दी थी कि ज्योंही काश्मीर से आक्रमणकारी सेनाएं हटा ली जाएंगी और वहां शान्ति का वातावरण बन जाएगा, त्योंही भारत वहां जनमत – संग्रह करवा कर काश्मीरी जनता को यह निर्णय करने का अवसर देगा कि वह भारत या पाकिस्तान में से किसके साथ मिलना चाहती है।

वस्तुतः इस प्रकार की घोषणा करना बिलकुल अनावश्यक था। जनमत संग्रह के लिए आवश्यक शर्ते अबतक भी पूरी नहीं हुई हैं, किन्तु पाकिस्तान तब से निरंतर जनमत संग्रह का ही राग अलापता रहता है। इस बीच में संयुक्त राष्ट्रसंघ ने काश्मीर के विवाद में मध्यस्थता करने के लिए कई मध्यस्थ भेजे। किन्तु अब तक किनीको भी सफलता नहीं मिली।

सबसे पहले एडमिरल चेस्टर निमिट्ज़ मतसंग्रह – अधिकारी बनाए गए थे, किन्तु मत संग्रह के लिए उपयुक्त वातावरण ही तैयार नहीं किया जा सका। १ ९ ५० में सर प्रोवन डिक्सन को और उनके बाद डाक्टर ग्राहम को मध्यस्थ बनाकर काश्मीर भेजा गया, किन्तु दोनों ही सफल न हो सके। उनके बाद १ ९ ५७ में स्वीडन के श्री जारिंग भी इस मामले का फैसला कराने आए, किन्तु भारत और पाकिस्तान दोनों से विचार – विमर्श करने के बाद वे भी असफल ही लौट गए।

इस बीच में काश्मीर की प्रगति रुकी नहीं। १६५१ में काश्मीर में संविधान सभा के चुनाव हुए और इस संविधान सभा ने अपना एक संविधान बनाकर काश्मीर में लागू कर दिया। इस संविधान ने भी काश्मीर को भारत के साथ मिलाने का समर्थन किया। उस समय काश्मीर में सबसे अधिक लोकप्रिय नेता शेख अब्दुल्ला था। शेख अब्दुल्ला ने कुछ विदेशी शक्तियों की सहायता से ऐसा षड्यन्त्र रचना शुरू किया, जिससे संविधान – सभा के निर्णय को रद्द करके काश्मीर को फिर एक स्वतन्त्र राज्य बना दिया जाए।

उन्हीं दिनों प्रसिद्ध जनसंधी नेता डा . श्यामाप्रसाद मुखर्जी काश्मीर गए। शेख अब्दुल्ला की सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया और गिरपतारी की दशा में ही डा ० मुखर्गी का देहान्त हो गया। इससे भी शेख अब्दुल्ला के खिलाफ देश भर में रोष छा गया। अन्त में शेख अब्दुल्ला के षड्यन्त्र का भंडा फुट गया। शेख को गिरफ्तार कर लिया गया और बनी गुलाम मुहम्मद काश्मीर के नये प्रधानमंत्री बने। बल्पी गुलाम मुहम्मद काश्मीर और भारत की एकता के पक्के समर्थक हैं।

उनका कथन है कि काश्मीरकी संविधान – सभा काश्मीरी जनता के सच्चे प्रतिनिधियों की सभा है और उसका निर्णय जनमत – संग्रह के समान ही प्रामाणिक है और अब अलग से जनमत संग्रह कराने की कोई आवश्यकता नहीं है। समय बीतने के साथ – साथ काश्मीर के मामले में और भी नई – नई उलझने खड़ी होती जा रही हैं। पिछले वर्षों में पाकिस्तान ‘ बगदाद – पक्ट ‘ का सदस्य वन गया।

इसके अतिरिक्त अमेरिका के साथ एक और सैनिक संथि करके उसने बहुत सी सैनिक सहायता प्राप्त की, जिसके कारण एशिया का पाक्ति सन्तुलन एकदम बदल गया। भारत का कथन है कि जिन परिस्थितियों में उसने जनमत संग्रह कराने की बात स्वीकार कर ली थी, वे अब जड़मूल से ही बदल चुकी हैं और पाकिस्तान ने काश्मीर से अपनी सेनाएं भी हटाई नहीं, इसलिए जनमत संग्रह का प्रश्न अब उठता ही नहीं है। काश्मीर समस्या का शान्तिपूर्ण हल खोजने के लिए भारत और पाकिस्तान के प्रधानमन्त्रियों में भी कई बार भेट हुई, किन्तु कोई लाभ नहीं हुआ।

पिछले वर्षों में पाकिस्तान में सरकारें बहुत जल्दी – जल्दी बदलती रहीं और प्रत्येक सरकार अपनी स्थिति को सुदृढ़ बनाए रखने के लिए जनता का ध्यान काश्मी -समस्या की ओर लगाए रखती थी। १ ९ ५८ में पाकिस्तान में सैनिक तानाशाही कायम हो गई और वहाँ स्थायी और मजबूत सरकार बन गई। शुरू में जनरल अयूब ने भी काश्मीर की समस्या को हल करने के लिए युद्ध तक करने को भमकी दी थी। किन्तु युद्ध से काश्मीर की समस्या हल हो जाएगी, यह सोचना निरी मुर्खता है। बुद्ध दोनों ही देशों के लिए विनाशकारी सिद्ध होगा और पश्चिमी देश अपने स्वार्थ के लिए भारत और पाकिस्तान को लड़ाए रखना ही चाहते हैं।

ऐसा प्रतीत होता है कि या तो काश्मीर के लिए दोनों देशों में युद्ध छिटकर रहेगा या फिर काश्मीर के जितने भाग पर जिसका अधिकार है, उतने पर ही उसका अधिकार मान लिया जाएगा और वर्तमान स्थिति ही सांविधानिक रूप से ठीक स्थिति स्वीकार कर ली आएगी। यह निर्णय भले ही न्यायोचित न हो, किन्तु भावी संघर्ष से बचने की दृष्टि से सरल और सुविधाजनक अवश्य रहेगा। अब १६ सितम्बर, १ ९ ६० को नहरी पानी विदाद का समझौता हो जाने से यह आशा होने लगी है कि काश्मीर समस्या का भी कोई शान्तिपूर्ण हल निकल सकेगा।

इसे भी पढ़े।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *