भारत के वीर योद्धा महाराणा प्रताप की जीवन कथा | maharana pratap biography hindi

हेलो दोस्तों हम भारत के वीर योद्धा महाराणा प्रताप की जीवन कथा (maharana pratap biography hindi) को विस्तार में पढ़ेंगे।

भारत के वीर योद्धा महाराणा प्रताप की जीवन कथा | maharana pratap biography hindi

महाराणा प्रताप की जीवन कथा

स्वाधीनता की वेदी पर अपना सर्वस्व निछावर कर देने वालों और स्वाधीनता के लिए भयंकरतम कष्ट सहने वाले वीरों में राणा प्रताप का नाम सबसे ऊपर लिसे जाने योग्य है। भारत के इतिहास में राणा प्रताप वारता के प्रतीक गिने जाते हैं। उन्होंने आजीवन कष्ट सहकर भी अपनी राजपूती आन को बनाए रखा और हजार प्रलोभन होने पर भी वे डिगे नहीं और उन्होंने अकवर का सामन्त बनना स्वीकार नहीं किया।

स्वाधीनता के लिए किए गए बलिदानों ने उनके नाम को सदा के लिए उज्वल कर दिया है। राजस्थान में मेवाड़ एक छोटा – सा राज्य है। इसकी राजधानी चित्तौड़ थी। वहां सिसोदिया वंश का राज्य था। इस वंश में पहले बड़े – बड़े वीर राजा जन्म ले चुके थे। राणा कुम्भा ने बड़ी – बड़ी विजय प्राप्त करके चित्तौड़ में एक कीति – स्तम्भ बनवाया था।

कुम्भा के बाद राणा संग्रामसिंह ने भी अपनी वीरता की धाक दूर दूर तक जमाई,किन्तु बावर साथ हुई सीकरी की लड़ाई में सांगा हार गया। सांगा के पुत्र उदयसिंह ने कोई विशेष उल्लेखनीय कार्य नहीं किया ; किन्तु उदयसिंह के पुत्र राणा प्रताप में अपने दादा की वीरता फिर दिखाई पड़ी। उन दिनों दिल्ली पर अकबर का राज्य था। अकबर बीर,बुद्धिमान और नीति – निपुण शासक था।

उसने यह समझ लिया था कि यदि उसे भारत में अपना साम्राज्य जमाना है,तो हिन्दू राजाओं से बैर – विरोध करके उसका काम नहीं चल सकता। इसलिए उसने हिन्दू राजाबों को अपना मित्र बनाने की हर संभव चेष्टा की ; यहां तक कि उनके साथ विवाह – सम्बन्ध भी स्थापित किए। अकबर की इस नीति का परिणाम यह हुआ कि थोड़े समय में लगभग सभी हिन्दू राजा अकबर के मित्र बन गए,जिसका अर्थ था कि वे अकबर के अधीन हो गए।

परन्तु मेवाड़ के राणा अपने आपको राजपूतों में सर्वश्रेष्ठ समझते थे,इसलिए उन्होंने अकबर की अधीनता स्वीकार करना या अपनी कन्याओं का विवाह मुगलों के साथ करना स्वीकार नहीं किया और प्राण रहते अपनी स्वाधीनता बनाए रखने का संकल्प किया। किन्तु शक्तिशाली अकबर यह कैसे देख सकता था कि जब बाकी सारा राजस्थान बल या नीति से उसके वश में हो गया है,तब एक छोटा – सा मेवाड़ राज्य स्वतन्त्र रह जाए।

इसलिए वह सदा मेवाड़ को हराने के लिए प्रयत्नशील रहता था। परन्तु मेवाड़ को हराना आसान काम नहीं था। मेवाड़ दिल्ली से दूर था और बीच का रास्ता सेनाओं के अवागमन के लिए बहुत भला नहीं था ; और सबसे बड़ी बात यह कि मेवाड़ की प्रजा भी अपनी स्वाधीनता के लिए लड़ मरने को तैयार थी। एक बार जयपुर के राजा मानसिंह का राणा प्रताप से कुछ वैमनस्य हो गया। मानसिंह का अकबर के दरबार में बहुत प्रभाव था। अकबर ने राणा प्रताप को हराने के लिए एक बड़ी सेना भेजी।

राणा प्रताप ने हल्दीघाटी में इस सेना से मोर्चा लिया। राजपूतों ने युद्ध में अनुपम वीरता दिखाई,किन्तु इतनी बड़ी मुगल सेना के मुकाबले में वे जीत न सके। अधिकांश राजपूत सेना युद्ध में ही कट मरी। राणा प्रताप भी उस युद्ध में ही काम पाए होते,किन्तु झालावाड़ के नरेश मान सिंह ने उनको बचाने के लिए अपने प्राण दे दिए और उनसे अनुरोध किया कि वे युद्धक्षेत्र से बाहर निकल जाएं,जिससे मेवाड़ की स्वाधीनता की लड़ाई को आगे भी जारी रख सकें।

राणा प्रताप का अपने छोटे भाई शक्तिसिंह से पहले कभी झगड़ा हो गया था,जिससे रुष्ट होकर शक्तिसिंह अकबर के पास चला गया था। अब जब राणा प्रताप युद्धक्षेत्र से लौटने लगे तब पाक्तिसिंह ने उन्हें देख लिया। उसने यह भी देखा कि दो मुगल सिपाही राणा प्रताप का पीछा कर रहे हैं। उसके हृदय में भ्रातृ प्रेम जाग उठा। उसने अपना घोड़ा उन मुगल सिपाहियों के पीछे डाल दिया।

कुछ दूर पहुंचने पर उसने उन दोनों सिपाहियों को मार डाला और राणा प्रताप से भेंट की। इस विपत्ति के समय में दोनों अपनी पुरानी शत्रुता भूल गए और प्रेम से गले मिले। उसी समय राणा प्रताप के स्वामिभक्त घोड़े चेतक की मृत्यु हो गई। शक्तिसिंह ने राणा प्रताप को अपना घोड़ा दे दिया और वापस लौट आया। उसके बाद राणा प्रताप का घोर कठिनाइयों का जीवन शुरू हुआ। चित्तौड़ उन्हें छोड़ देना पड़ा। वे पहाड़ों में रहते थे और समय – समय पर मुगलों की रसद को लूटकर अपना काम चलाते थे।

परन्तु बहुत बार उन्हें खाने को रोटी तक न मिलती थी। वर्षों तक इस प्रकार लड़ते – लड़ते और कष्ट सहते – सहते एक बार कहते हैं कि राणा प्रताप की भी हिम्मत टूट गई और उन्होंने अकबर के नाम संधि का संदेश भेजा। अकबर के दरबार में पृथ्वीराज नाम का एक राजपूत कवि रहता था। संदेश देखकर उसने अकबर से कहा कि यह कोई जाली संदेवा मालूम होता है। ये राणा प्रताप के हस्ताक्षर नहीं हैं। पृथ्वीराज ने एक पत्र लिखकर राणा प्रताप को अपनी लड़ाई जारी रखने के लिए उत्साहित किया।

राणा प्रताप में नया साहस और नया धैर्य पा गया। उन्होंने फिर अपनी लड़ाई शुरू कर दी। अपनी मृत्यु से पहले वह मेवाड – राज्य के काफी बड़े भाग को वापस जीत चुके थे। मृत्यु के समय राणा प्रताप को इस बात का भय था कि उनका पुत्र अमरसिंह बैसा चित्त और धैर्यवान योद्धा नहीं है,जैसे कि वे स्वयं थे ; इसलिए कहीं वह युद्ध बन्द करके अकबर का सामन्त बनना स्वीकार न कर ले।

परन्तु राणा प्रताप के विश्वस्त सरदारों ने उन्हें भरोसा दिलाया कि हमारे जीते जी ऐसा नहीं होगा। अमरसिंह मेवाड़ को स्वाधीन रखेगा। यह सुनकर राणा प्रताप को बहुत संतोष हुआ और उन्होंने बड़ी शान्ति के साथ इस संसार से प्रस्थान किया। राणा प्रताप का जीवन दृढ़ता,वीरता,बलिदान,साहस और धैर्य की एक उज्वल कहानी है।

स्वाधीनता का ऐसा पुजारी हमारे देश के इतिहास में शायद ही कोई हुआ हो। उन्हें मालूम था कि उनका विरोधी अकबर बहुत शक्तिशाली है और अनेक हिन्दू राजा उसके साथ मिल चुके हैं ; उसका विरोध करके विजय की आशा नहीं है,फिर भी पराजित होकर अधीनता का जीवन बिताना,उन्होंने पसन्द नहीं किया।

यदि वे चाहते तो अरावली की सूखी पहाड़ियों में भटकने के बजाय अकबर से सन्धि करके मुख से महलों में निवास कर सकते थे। परन्तु सुख के लिए अपने आदर और सम्मान का बलिदान करना उन्हें न रुचा। उन्होंने यह समझा कि स्वाधीनता की सूखी रोटी गुलामी के हलवे से कहीं अच्छी है।

यही कारण है कि आज इतिहास में राणा प्रताप का उल्लेख तो इतने विस्तार और सम्मान के साथ होता है,किन्तु जिन अनेक राजाओं ने युद्ध और कष्ट से बचने के लिए,सुख पाने के लिए,अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली थी,उनके नाम भी कोई नहीं जानता ; और यदि कभी जान भी पाता है तो उनको सम्मान की दृष्टि से नहीं देखता। राणा प्रताप स्वाधीनता के महान पुजारी और हमारे महान जातीय नेता थे। उनकी वीरता की कहानी चिरकाल तक युवकों के हृदय में साहस और बल का संचार करती रहेगी।

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