नागरिकता का अर्थ एवं परिभाषा पर निबंध

हेलो आज का हमरा विषय है की “नागरिकता का अर्थ एवं परिभाषा” जिसमे हम पढ़ेंगे की नागरिकता क्या होता है, नागरिकता से क्या समझते हैं और नागरिकता कितने प्रकार की होती है। तो इस नागरिकता पर निबंध के माधयम से इन सवालो के जवाब जानते है।

नागरिकता का अर्थ एवं परिभाषा पर निबंध - naagarikata ka arth evan paribhaasha par nibandh -

नागरिकता का अर्थ एवं परिभाषा पर निबंध

किसी भी देश में प्रजातन्त्र पासन – प्रणाली तभी सफल हो सकती है, जब उस देश के सब निवासियों में नागरिकता की भावना भली भांति विद्यमान हो। नागरिकता का अर्थ यह है कि मनुष्य को अपने कर्तव्यों और अधिकारों का भली भांति ज्ञान हो। कर्तव्यों का पालन कराने के लिए उसे किसी दंड के भय की आवश्यकता न हो और अपने अधिकारों को प्राप्त करने के लिए वह संघर्ष करने को भी तैयार हो। तानाशाही शासन में नागरिकता के विकास की गुंजाइश नहीं होती।

अत्यन्त प्राचीन काल में, जब मनुष्य समाज में नहीं रहता था, तो वह चाहे जैसा स्वच्छन्द जीवन बिता सकता था। किन्तु जब से उत्तने समाज में रहना शुरू किया है, तब से उसे समाज के अनेक नियमों को मानकर ही चलना पड़ता है ; क्योंकि यदि उन नियमों को न माना जाए, तो समाज का अस्तित्व ही नहीं रह सकता। समाज में रहने के कारण मनुष्य को अनेक लाभ होते हैं। इसलिए वह समाज से बाहर रहना नहीं चाहता। समाज द्वारा बनाए गए नियमों का पालन करना मनुष्य का कर्तव्य है और समाज द्वारा प्राप्त होने वाले लाभ मनुष्य के अधिकार हैं।

इस प्रकार प्रत्येक नागरिक के कुछ कर्तव्य और कुछ अधिकार होते हैं। नाग रिक का सबसे बड़ा कर्तव्य यह है कि वह अपने देश की सुरक्षा व शांति के लिए सदा प्रयत्नशील रहे। इसका अर्थ यह है कि यदि देश पर कोई विदेशी आक्रमण हो या देश में कोई आन्तरिक उपद्रव या उत्सात हो, तो उस समय वह बिना दुविधा में पड़े सरकार की सहायता करे ; क्योंकि सरकार ही विदेशी आक्रमण का सामना और आन्तरिक उपद्रव का दमन कर सकती है।

प्रजातंत्र में सरकार जनता की अपनी पुनी हुई होती है, इसलिए हर प्रकार से उस सरकार के हाथ मजबूत करने का प्रयत्न करना चाहिए। सरकार का काम धन से चलता है। यह धन सरकार को विभिन्न प्रकार के करों द्वारा प्राप्त होता है, इसलिए हरएक नागरिक का कर्तव्य है कि वह सरकार द्वारा लगाए गए करों को ईमानदारी से और प्रसन्नता के साथ चुकाए। कर देने में बेईमानी करना सरकार को और देश को नुरूसान पहुंचाना है।

स्वच्छता जीवन का एक आवश्यक अंग है। मनुष्य को अपने शरीर, वस्त्र और घर को तो साफ रखना ही चाहिए, क्योंकि यह उसके अपने स्वास्थ्य और आनन्द के लिए आवश्यक है, परन्तु सामाजिक स्वच्छता के लिए यह आवश्यक है कि व्यक्ति अपनी गली, अपने मुहल्ले और अपने शहर को साफ रखने का भी प्रयत्न करे। यदि सब लोग सफाई का ध्यान रखें, तो गली, मुहल्ले और शहर बड़ी आसानी से साफ रह सकते हैं। परन्तु बहुत – से लोग अपना घर साफ करके कूड़ा पड़ौसी के घर के सामने फेंक देते हैं।

यह नागरिकता के नियमों के प्रतिकूल है। कूड़ा ऐसी जगह फेंका जाना चाहिए, जहां से उसे उठाकर ले जाने का नगरपालिका की ओर से प्रबन्ध हो। समाज में अनेक वर्गों और सम्प्रदायों के लोग रहते हैं। उन सबकी प्रथाएं और रीति – रिवाज पृथक् होते हैं। उनकी रुचियां भिन्न होती हैं। इसलिए यह सम्भव है कि उनमें अनेक बार वैमनस्य उत्पन्न हो जाए।

परन्तु अच्छे नागरिक को इन सब मामलों में उदार और सहिष्णु होना चाहिए, जिससे जनता में शान्ति और प्रेम बना रहे। विपत्ति के समय अपने पड़ौसी की सहायता करना भी नागरिक का कर्तव्य है। जब सब नागरिकों में यह भावना विद्यमान रहती है कि उन्हें एक दूसरे की सहायता करनी है, तब समाज विपत्तियों का सामना आसानी से कर सकता है।

संसार में ऐसा कोई देश या समाज नहीं है, जहां भले लोगों के साथ – साथ दुष्ट और समाज – विरोधी लोग भी न रहते हों। इन समाज – विरोधी तत्त्वों का दमन करना पुलिस और सरकार का काम है। परन्तु अकेली पुलिस तब तक अपना काम सफलतापूर्वक, नहीं कर सकती, जब तक उसे नागरिकों का पूरा सहयोग प्राप्त न हो।

इसलिए समाज – विरोधी तत्त्वों का दमन करने में पुलिस को सहायता देना हर एक नागरिक का कर्तव्य है। इन कर्तव्यों का पालन करने के बदले नागरिक को जो अधिकार प्राप्त हैं, वे भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं हैं। इन अधिकारों को उसे अवश्य प्राप्त करना चाहिए और इनसे लाभ उठाना चाहिए। इन अधिकारों में सबसे बड़ा निर्भय और निश्चिन्त होकर जी सकने का अधिकार है।

अच्छे समाज में मनुष्य को निर्भय होकर जी सकना चाहिए और यह राज्य का कर्तव्य है कि वह सब नागरिकों को यह अधि बार प्रदान करे 1 निर्भय जी सकने के साथ – साथ मनुष्य को अपनी उन्नति के लिए या जीविका उपार्जन के लिए सब कानून – सम्मत उपायों को अपनाने का अधिकार है। अर्थात् यदि किसी मनुष्य ने कानून – सम्मत उपायों से धन कमाया हो या किसी प्रकार को सम्पत्ति जमा की हो, तो यह सम्पत्ति उससे छीनी नहीं जा सकती।

यदि कोई व्यक्ति उस सम्पत्ति को छीनने या चुराने का यत्न करे, तो राज्य की ओर से उसे दंड मिलता है। मनुष्य के मन में प्रभुत्व जमाने और शासन करने की भावना भी विद्यमान रहती है। राजतन्त्र या अधिनायकतन्त्र में सामान्य नागरिक की यह भावना तुप्त नहीं हो पाती। परन्तु प्रजातन्त्र में प्रत्येक व्यक्ति को वोट देने का अधिकार होता है, जिसके द्वारा वह देश के शासन में भाग ले सकता है।

संसद के लिए प्रति निधियों का चुनाव करके वह यह अनुभव करता है कि राज्य के संचालन में मेरा नौ हाथ है। इसलिए प्रजातन्त्र शासन में प्रत्येक नागरिक को वोट देने का समान अधिकार होता है। प्रजातन्त्र देशों में अभिव्यक्ति की स्वाधीनता भी नागरिक का बहुत बड़ा अधि कार समझी जाती है। मनुष्य केवल दूसरों की बातें ही नहीं सुनते जाना चाहता, अपितु वह अपनी बात भी दूसरों को सुनाना चाहता है।

यह भी पहले से नहीं कहा जा सकता कि कौन – सा व्यक्ति कोई ऐसी नई और अच्छी बात कह सकेगा, जो आगे चलकर देगा और समाज के लिए हितकारी सिद्ध होगी। इसलिए सब लोगों को वह अधिकार दिया जाता है कि वे भाषण द्वारा या लेखों द्वारा अपने विचारों का प्रचार कर सकते हैं। परन्तु इस स्वाधीनता पर इतना प्रतिबन्ध अवश्य लगाना पड़ता है कि कोई व्यक्ति ऐसे विचार प्रकट नहीं कर सकता, जो दूसरों की भाव नाओं को ठेस पहुंचाने वाले हों या जो समाज में वर्ग – द्वेष को बढ़ाने वाले हो।

जो देश जितना उन्नत और समृद्ध होता है, उसमें नागरिकों को उतने ही अधिक अधिकार प्राप्त होते हैं ; जैसे अनेक देशों में नागरिकों को शिक्षा और चिकित्सा की सुविधाएं निःशुल्क प्राप्त करने का अधिकार है। बहुत – से देशों में लोगों को रोजी प्राप्त करने का भी अधिकार प्राप्त है अर्थात् यदि किसी आदमी को काम न मिले, तो उसे सरकार की ओर से बेकारी – भत्ता दिया जाता है।

कल्याण राज्य में यह समझा जाता है कि सब नागरिकों के सुख और सुविधा की व्यवस्था करना सरकार का काम है। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि राज्य और नागरिक दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। जो नागरिक के कर्तव्य है, वे राज्य के अधिकार हैं, और जो नागरिक के अधिकार हैं, वे राज्य के कर्तव्य है। यदि राज्य और नागरिक दोनों अपने कर्तव्यों का पालन ठीक – ठीक करते रहें, तो दोनों को उनके अधिकार मिलते रहेंगे और देश और समाज निरन्तर उन्नत और समृद्ध होता जाएगा। कर्तब्ध के अभाव में अधिकार की कल्पना भी नहीं की जा सकती।

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