प्रजातन्त्र और तानाशाहा पर निबंध हिंदी में

प्रजातन्त्र और तानाशाहा पर निबंध हिंदी में

प्रजातन्त्र और तानाशाहा पर निबंध

प्रजातन्त्र और तानाशाहो द्वितीय विश्व युद्ध से पहले संसार के अनेक देशों में प्रजातंत्र – शासन – पद्धति विद्यमान थी, किन्तु जर्मनी, इटली और स्पेन में तानाशाही अर्थात् अधिनायक तन्त्र की स्थापना हो गई थी। उन दिनों प्रजातन्त्र और तानाशाही वाले देशों में आपस में मुकाबला था, इसलिए बार – बार लोगों के सामने यह प्रश्न उठता था कि प्रजातन्त्र – शासन – पद्धति अच्छी है या तानाशाही शासन – पद्धति ?

प्रजातन्त्र में शासन की बागडोर जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों के हाथ में होती है, इसलिए राज्य के कार्य जनता की इच्छा के अनुसार ही होते हैं। यदि सरकार की कोई नीति जनता को पसन्द न हो, तो जनता उसका विरोध कर सकती है। प्रजातन्त्र में हरएक व्यक्ति को अपने विचार प्रकट करने की स्वतंत्रता रहती है। इसका लाभ यह होता है कि एक ओर तो सरकार को यह पता चलता रहता है कि उसकी किस नीति से जनता सन्तुष्ट या असन्तुष्ट है।

दूसरी ओर जनता का असन्तोष भी मन का गुबार निकल जाने के कारण कम हो जाता है। इसलिए प्रजातन्त्रीय देशों में प्रायः हिंसात्मक क्रान्तियां नहीं होती। प्रजातन्त्र में शासक और शासित का भेद हट जाता है। जनता यह समझती है कि सरकार उसकी अपनी बनाई हुई है, इसलिए लोग कानूनों का स्वेच्छा से पालन करते हैं। वे समझते हैं कि कानून उनके हित के लिए बनाए गए हैं। इस प्रकार वासन दण्ड के भय से नहीं, अपितु जनता के सहयोग से ही चल रहा होता है।

यदि सरकार की कोई नीति जनता की इच्छा के विरुद्ध हो, तो उस सरकार को बदल देना जनता के अपने हाथ में है। वैसे तो सदा ही सरकार पर जनता की चुनी हुई संसद ( पार्लियामेंट ) का नियन्त्रण रहता है, परन्तु यदि कभी जनता यह समझे कि संसद भी उसकी इच्छा के प्रतिकूल काम कर रही है, तो अगले चुनावों में वह सारी संसद को ही बदल दे सकती है। इस बात को सरकार और राजनीतिक दल भी खूब समझते हैं।

इसलिए वे जनता को प्रसन्न रखने का पूरा यन्न करते हैं। प्रजातन्त्र में किसी भी विषय पर निर्णय करना एक व्यक्ति के हाथ में नहीं होता, बहुत से लोगों के हाथ में होता है। इसलिए हर समस्या के हरएक पहलू पर अच्छी तरह विचार कर लिया जाता है और उसके बाद ही उसपर निर्णय होता है। इस प्रकार गलत निर्णय होने की सम्भावना बहुत कम हो जाती है।

इसके विपरीत तानाशाही में निर्णय एक व्यक्ति के हाथ में होता है और वहां गलती होने की सम्भावना बहुत अधिक होती है। प्रजातन्त्र के पक्ष में सबसे बड़ी बात यह कही जाती है कि इसमें व्यक्ति के विकास की सबसे अधिक गुंजाइश होती है। वह समझा जाता है कि राज्य का उद्देश्य व्यक्ति के व्यक्तित्व का विकास करना है।

तानाशाही में सब लोग अधि नायक से दवे रहते हैं और डरे रहते हैं। इसलिए उनके व्यक्तित्व का पूरा विकास नहीं हो पाता। परन्तु प्रजातन्त्र में सब व्यक्तियों को समान अधिकार होते हैं और हरएक व्यक्ति को ऊंचे से ऊंचे पद तक पहुंच पाने का अवसर रहता है। किन्तु इन अच्छाइयों के साथ – साथ प्रजातन्त्र में बहुत – से दोष भी हैं।

प्रजातन्त्र में शासन की बागडोर हुल्लड़वाया लोगों के हाथ में पा जाती है। जनता की इच्छा का सिद्धान्त – रूप में तो आदर किया जाता है, परन्तु व्यवहार में नहीं। जिन देशों में शिक्षा बहुत नहीं है, वहां पर लोगों को लोभ या भय दिखाकर उनसे बोट ले लिए जाते हैं और इस प्रकार अनेक बार जनता चाहते हुए भी सरकार को नहीं बदल पाती।

प्रजातन्त्र में लोगों की कार्यक्षमता घट जाती है। सब काम धीरे – धीरे होते हैं। हरएक प्रश्न पर लम्बा विवाद होता है, जिससे निर्णय होने में बहुत देर लगती है। प्रजातन्त्र में दंड का भय घट जाता है। लोग बेईमानी और रिश्वतखोरी की ओर झुके चलते हैं। राज्य के व्यय पर अपना उल्लू सीधा करने की प्रवृत्ति लोगों में बढ़ जाती है। युद्ध इत्यादि संकट की दशाओं में प्रजातन्त्र कमजोर सिद्ध होते हैं।

इसके विपरीत तानाशाही – पद्धति में सब काम चटपट होते हैं और भली भांति हो पाते हैं। तानाशाही में एक व्यक्ति के आदेश से राज्य की नीति निर्धारित होती है। इसलिए वहां निर्णय होने में कोई देर नहीं लगती। लोगों में दंड का भय रहता है। इसलिए सब लोग अपने कर्तव्य का यथाशस्ति ईमानदारी से पालन करते हैं और पालन न करने की दशा में उन्हें दंड भुगतना पड़ता है।

यदि अधिनायक अच्छा हो, तो वह सारे देश में एक नई जान फूंक सकता है। द्वितीय विश्व – युद्ध से पहले इटली और जर्मनी में मुसोलिनी और हिटलर ने अपने दोनों राष्ट्रों को संसार के सबसे उन्नत राष्ट्रों की श्रेणी में ला खड़ा किया था। अधिनायकतन्त्र में, क्योंकि सारी सत्ता एक आदमी के हाथ में होती है . इस लिए उस एक आदमी के अच्छा और ईमानदार होने से सारा देश अच्छा और ईमानदार बन सकता है।

परन्तु इसमें यह भय भी है कि यदि वह एक अधि नायक अच्छा न हो, तो सारा शासन बिगड़ जा सकता है और देश पतन की ओर बढ़ता जा सकता है। भारतीय इतिहास में मुगल साम्राज्य के अन्तिम दिनों में यही कुछ हुआ था। अधिनायकतन्त्र में मनुष्य को उन्नति करने के अवसर रहते हैं। इसका सबसे बड़ा प्रमाण यही है कि अधिनायक वही व्यक्ति बन पाता है, जो अपने गुणों और योग्यता के द्वारा शेष व्यक्तियों को अपने अधीन रहने के लिए तैयार कर लेता है।

परन्तु अधिनायकतन्त्र में पक्षपात होने की संभावना रहती है। जो व्यक्ति अधि नायक की दृष्टि में अच्छा हो, उसकी पदोन्नति जल्दी होती जाती है। और जिसे ऐसा सौभाग्य न मिले, वह उपेक्षित रह जाता है। परन्तु इस प्रकार का पक्षपात प्रजातन्त्र में भी कम नहीं होता। वस्तुतः सामान्य जनता में वीर पूजा की भावना होती है।

यदि कोई एक अनेक गुण – सम्पन्न अधिनायक देश का शासन करने लगता है, तो लोग उसका सादर करते हैं और उससे प्रेरणा पाकर देश के लिए बहुत कुछ बलिदान करने को तैयार हो जाते हैं। प्रजातंत्र में वीर – पूजा का यह तत्व विद्यमान नहीं होता। परन्तु अधिनायकतंत्र को यही दुबलता भी है।

अधिनायकतंत्रीय देश अधिनायक के हट जाने पर पतन की ओर बढ़ चलते हैं। परन्तु प्रजातंत्र में ऐसा भय नहीं रहता, क्योंकि वहां नेतृत्व के लिए अनेक व्यक्ति तैयार रहते हैं। प्रजातंत्र में एक बड़ा दोष यह होता है कि लोगों का ध्यान चुनावों की ओर लगा रहता है। लोग चुनाव लड़ते हैं। उसमें बहुत – सा अनावश्यक व्यय होने के अतिरिक्त लोगों में स्वार्थ की भावना बढ़ती है। हरएक प्रश्न के पक्ष और विपक्ष में लम्बे – लम्बे वाद – विवाद होने से लोगों में बुद्धि – भेद फैलता है।

राष्ट्र की शक्तियां वटी – वंटी – सी रहती हैं। अधिनायकतन्त्र में अनेक पक्ष सामने न होने के कारण सब लोगों की शक्तियां एक ही दिशा में केन्द्रित रहती हैं। यह ठीक है कि अधिनायकतन्त्र में व्यक्ति को उतनी स्वतन्त्रता नहीं रहती, जितनी प्रजातन्त्र में रहती है, परन्तु प्रजातन्त्र की स्वतन्त्रता का उपयोग लोग वेईमानी करने, मुनाफाखोरी करने इत्यादि के लिए भी करते हैं।

अनियन्त्रित स्वतन्त्रता किसी भी प्रणाली में नहीं दी जा सकती। नियन्त्रित स्वतन्त्रता ताना शाही प्रणाली में भी रहती है। तानाशाही प्रणाली का सबसे बड़ा दोष यह है कि इसमें निर्णय एक व्यक्ति के हाथ में रहता है। वह व्यक्ति प्रावेश या भावुकता के क्षणों में गलत निर्णय भी कर सकता है और उस गलती का फल सारे राष्ट्र को भुगतना पड़ता है।

हिटलर के नेतृत्व में जर्मनी ने जितने थोड़े काल में जितनी अधिक उन्नति की थी, उसकी तुलना शायद सारे संसार के इतिहास में कहीं न हो। परन्तु एक आदमी के निर्णय की एक – दो गलतियों ने ही जर्मनी को फिर विनाश के मुख में धकेल दिया। प्रजा तंत्रीय देशों में ऐसी गलतियां कम होती हैं। शायद इसीलिए प्रजातन्त्रीय देश शांति प्रेमी होते हैं और अधिनायकतन्त्रीय देशों का झुकाव युद्ध की ओर अधिक रहता है।

चाहे जो हो, किन्तु इस समय सारे संसार में प्रजातन्त्र का बोलबाला है। सभी बड़े – बड़े देशों में प्रजातंत्र स्थापित हो चुका है। किन्तु मजे की बात यह है कि हर एक देश अपने को प्रजातन्त्रवादी देश कहता है, और दूसरे को अधिनायकतंत्रीय। अनेक दोषों के होते हुए भी सभी देश अपने आपको प्रजातन्त्रीय देश कहने में गौरव अनुभव करते हैं।

हाल के पिछले कुछ वर्षों में अनेक देशों में अधिनायक तन्त्रीय प्रवृत्तियों ने फिर सिर उभारा है परन्तु वे देश भी प्रजातंत्र को त्यागने की घोषणा करते हिचकिचाते हैं। इससे स्पष्ट है कि सिद्धान्त की दृष्टि से प्रजातन्त्र को सर्वोत्तम शासन – प्रणाली समझा जाता है। यह बात दूसरी है कि उस सिद्धान्त को पूरी तरह व्यवहार में सब जगह नहीं लाया जा सकता।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *