प्रजातन्त्र शासन प्रणाली पर निबंध

प्रजातन्त्र शासन प्रणाली पर निबंध

प्रजातन्त्र शासन प्रणाली निबंध

उन्नीसवीं शताब्दी में लगभग सारे संसार में राजाओं का राज्य कायम था। किन्तु बीसवीं शताब्दी में वे राजा एक – एक करके समाप्त होते गए और उनके स्थान पर प्रजातंत्र – शासन – पद्धतियां स्थापित हो गई। फ्रांस, जर्मनी, रूस, स्पेन आदि देशों में राजतन्त्र समाप्त होकर प्रजातन्त्र कायम हुआ। आजकल प्रजातंत्र का युग है और बात – बात में प्रजातत्र की दुहाई दी जाती है। इस समय संसार के सभी बड़े – बड़े देशों में प्रजातंत्र – शासन – पद्धति ही चल रही है।

प्रजातंत्र का अर्थ है – प्रजा का शासन। प्रजातंत्र की सबसे अच्छी व्याख्या अमेरिका के राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन की मानी जाती है, जिसमें उसने कहा था, ” प्रजातंत्र का अर्थ है, जनता द्वारा जनता के हित के लिए जनता की सरकार की स्थापना। इससे स्पष्ट है कि प्रजातन्त्र में शासन की बागडोर प्रजा के हाथ में होती है और वह शासन प्रजा के हित के लिए ही किया जा रहा होता है।

परन्तु प्रजातत्र में सारी जनता प्रत्यक्ष रूप से शासन नहीं करती, अपितु प्रजा के चुने हुए प्रतिनिधि शासन करते हैं। इतना अवश्य है कि इन प्रतिनिधियों को जनता की इच्छा के अनुसार ही कार्य करना पड़ता है, क्योंकि यदि वे ऐसा न करें, तो आगामी चुनावों में जनता उनको हटाकर उनकी जगह नये प्रतिनिधि चुन सकती है।

इससे स्पष्ट है कि प्रजातन्त्र में केवल वही प्रतिनिधि शासन करते रह सकते हैं, जिन्हें जनता का विश्वास प्राप्त हो। प्रजातन्त्र – शासन – प्रणाली के बहुत से लाभ बतलाए जाते हैं। कहा जाता है कि प्रजातन्त्र – शासन में व्यक्ति को राज्य की अपेक्षा अधिक प्रधानता दी जाती है। यह माना जाता है कि राज्य का उद्देश्य व्यक्ति को अपने विकास के लिए पूरा अवसर देना है। इसलिए राज्य केवल साधन है और साध्य व्यक्ति है।

इसके लिए प्रजा तन्त्र – शासन में व्यक्ति को अधिक से अधिक स्वतन्त्रता दी जाती है। वह अपने वोट द्वारा चाहे जिसे अपना प्रतिनिधि चुन सकता है। वह स्वतन्त्रतापूर्वक अपने विचार भाषण या लेखों के रूप में प्रकट कर सकता है। किन्तु अभिव्यक्ति की यह स्वत बता केवल उसी सीमा तक होती है, जहां तक कि वह दूसरों की स्वतन्त्रता में बाधक न बने। प्रजातन्त्र – शासन – पद्धति में लोगों को अभिव्यक्ति की स्वाधीनता देने का एक प्रयोजन है।

पिछले इतिहास को देखकर यह पता चलता है कि क्रान्तियां तभी हुई जब कि जनता को बहुत – से अत्याचारों और कष्टों का सामना करना पड़ा। किन्तु प्रजा को अपने कष्ट प्रकट करने तक का भी मौका नहीं दिया गया। बहुत समय तक तो लोग दबकर कष्ट सहते रहे और जब असह्य हो उठा, तो उन्होंने क्रांति कर दी।

प्रजातन्त्र में अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता रहने के कारण रक्तपातपूर्ण क्रान्तियों का खतरा बिलकुल नहीं होता, क्योंकि जनता न केवल अपने दुःख और कष्ट को बतला सकती है, अपितु अगर वह चाहे तो अपने बोट द्वारा सरकार को बदल भी सकती है। प्रजातन्त्र – शासन – पद्धति की सफलता के लिए कुछ बातें बहुत आवश्यक हैं।

पहली बात तो यह है कि प्रजातन्त्र – शासन – पद्धति तभी सफल हो सकती है जब कि किसी देश की जनता सुशिक्षित हो और अपने अधिकारों के प्रति और साथ ही अपने कर्तव्यों के प्रति भी जागरूक हो। जहां जनता प्रशिक्षित हो और पैसे देकर लोगों के बोट खरीदे जा सकते हों, वहां प्रजातन्त्र – शासन केवल एक पाखंड बनकर रह जाता है।

दूसरी बात यह है कि देश में एक से अधिक सुसंगठित राजनीतिक दलः होने चाहिएं। जब एक बल पदारूव हो, उस समय विरोधी दल भी इतना समर्थ होना चाहिए कि वह सत्तारूढ़ दल के दोषों के विरुद्ध सफलतापूर्वक आवाज उठा सके।

तीसरी बात यह है कि देश में अनेक समाचारपत्र होने चाहिए और उन्हें यथासम्भव पूरी स्वतन्त्रता दी जानी चाहिए, जिससे वे जनमत को उचित दिशा में ले जा सकें। प्रजातन्त्र – वासन को इसलिए सर्वोत्तम पासन – प्रणाली समझा जाता है, क्योंकि इसमें प्रजा के ऊपर शासन करने की आवश्यकता कम से कम पड़ती है। सरकार जनता पर मनमाना अत्याचार नहीं कर सकती।

अगर करे, तो राजनीतिक दल और समाचारपत्र अच्छा – खासा आन्दोलन बडा उसके विरुद्ध प्रावाज उठाते हैं और सरकार को विवश करते हैं कि वह गलती को सुधारे। जनता अपने अधि कारों की रक्षा के लिए सदा सचेत रहती है। प्रजातन्त्र – शासन को ‘ कानून का शासन ‘ कहा जाता है। कानून की दृष्टि में सब व्यक्ति समान होते हैं और एक जैसा अपराध करने पर अमीर – गरीब, शिक्षित अशिक्षित सब लोगों को एक जैसा ही दंड भुगतना पड़ता है।

धर्म, लिंग अथवा पद इत्यादि के कारण किसीके साथ कोई भेद – भाव नहीं किया जा सकता। आजकल लगभग सभी देशों में प्रजातन्त्र – शासन – प्रणाली इस रूप में चल रही है कि जनता अपने प्रतिनिधि चुनती है। ये प्रतिनिधि प्रायः किसी न किसी दल के समर्थन से चुनाव लड़ते हैं। चुनावों में जिस दल का बहुमत होता है, उसका नेता अपना मंत्रिमंडल बनाता है।

मंत्रिमंडल देश की संसद के सम्मुख उत्तरदायी होता है और मंत्रिमंडल तभी तक पदारुद रहता है, जब तक संसद में उसका बहुमत हो। जब किसी दल का संसद में बहुमत नहीं रहता, तो उसके मंत्रिमंडल को इस्तीफा दे देना पड़ता है। इसीलिए प्रत्येक दल यह यल करता है कि वह जनता को सन्तुष्ट रखे। इस प्रकार जनता की इच्छा का शासन के हर मामले में पूरा ध्यान रखा जाता है।

संक्षेप में प्रजातन्त्र व्यक्ति को राज्य से बड़ा मानता है और व्यक्ति के विकास के लिए जो कुछ भी सम्भव हो, वह सब कुछ करने को तैयार रहता है। इन अनेक गुणों के साथ – साथ प्रजातन्त्र में कुछ एक दोष भी हैं। प्रसिद्ध विचा क प्लेटो ने प्रजातन्त्र शासन को ‘ मुखों का शासन ‘ कहा है। उसका कहना है कि दुनिया में मूर्ख अधिक होते हैं और बुद्धिमान कम।

बहुमत सदा मूखों का रहता है और इसीलिए बहुमत का शासन मुखों का शासन है। प्लेटो की बात तो हुई विशुद्ध तर्क की बात ; किन्तु इसमें सन्देह नहीं कि जहां की जनता सुशिक्षित और अपने अधिकारों के प्रति जागरूक न हो, वहां प्रजा तन्त्र केवल हुल्लडबाज लोगों का खेल बनकर रह जाता है।

चुनाव जीतने के लिए तरह – तरह के हथकंडों का प्रयोग किया जाता है और भले लोग चुनावों से दूर ही रहना पसन्द करते हैं। चुनाव में अधिकतर लोग किसी न किसी राजनीतिक दल का सहारा लेकर खड़े होते हैं और मतदाता उम्मीदवार की अच्छाई या बुराई पर ध्यान न देकर राजनीतिक दल को वोट देते हैं। यह कहना अनावश्यक है कि इस प्रकार चुने गए प्रतिनिधि जनता के सच्चे प्रतिनिधि नहीं कहे जा सकते।

जब कोई दल चुनाव जीत जाता है, तो उसका सारा प्रयत्न यह होता है कि जिन लोगों ने चुनाव जीतने में उसकी सहायता की है, उनको ऊंचे – ऊंचे पद दिए जाएं या उनके लाभ के लिए अन्य कार्य किए जाएं। इससे आपाधापी और पक्षपात का जन्म होता है। यदि इतने सब उत्पात – उपद्रवों के बाद भी किसी एक दल का बहुमत हो जाए, तब भी खैर है ; क्योंकि उस दशा में वह दल एक स्थायी सरकार बना सकता है।

परन्तु जब किसी एक दल को पूरा बहुमत प्राप्त नहीं होता, तो उसे दूसरे दलों से गठबन्धन करना पड़ता है। गठबन्धन के लिए दूसरे दलों को तरह – तरह की सुविधाएं दी जाती हैं और वहां जल्दी – जल्दी सरकारें बदलती रहती हैं। विरोधी दल होने का जहां यह लाभ है कि वह सरकार की गलतियों को प्रकाश में लाकर उसे सही रास्ते पर ला सकता है, वहां व्यवहार में देखा यह जाता है कि विरोधी दल सरकार के अच्छे – बुरे हर काम का विरोध करते हैं, जिससे जनता में हर बात पर दो सम्मतियां बन जाती हैं।

इससे देश को नुकसान पहुंचता है। प्रजातन्त्र – शासन का सबसे बड़ा और भयंकर दोष यह है कि इसमें कोई भी कार्य शीन नहीं हो पाता। संसदों में देर तक बहस चलती रहती है। इसलिए जब कभी युद्ध या किसी अन्य संकट के कारण अविलम्ब कार्रवाई करने की आव पयकता पड़ती है, तब प्रजातन्त्र – शासन बहुत सुस्त और कमजोर सिद्ध होता है।

इसके अतिरिक्त प्रजातंत्र – शासन महंगा बहुत पड़ता है। चुनावों पर बेहद रुपया व्यय किया जाता है और बाद में संसद के सदस्य किसी न किसी प्रकार उस धन राशि को वापस पाने का प्रयत्न करते हैं। संसद के सदस्यों के वेतन आदि पर बहुत बड़ी राशि व्यय होती है।

इस सब धन – राशि का सदुपयोग आसानी से रचनात्मक कार्यों के लिए किया जा सकता है। परन्तु इन सब दोषों के होते हुए भी आजकल इस बारे में प्रायः सभी लोग एकमत हैं कि अब तक ज्ञात शासन की सभी प्रणालियों में प्रजातन्त्र – शासन – पद्धति सबसे अच्छी है। यदि इसमें कुछ दोष हैं, तो अन्य शासन – प्रणालियों में भी कुछ दूसरे दोष हैं।

जहां शासन का सूत्र एक व्यक्ति के हाथ में या दो – चार इने – गिने व्यक्तियों के हाथ में होता है, वहां वे लोग भूल कर सकते हैं और उनकी भूल का परिणाम सारे देश को भुगतना पड़ता है। प्रजातन्त्र – शासन का यह दोष कि इसमें कोई काम जल्दी नहीं हो पाता, इस दृष्टि से गुण भी कहा जा सकता है कि इसमें जल्दबाजी में कोई काम नहीं होता।

प्रजातन्त्र की नई धारणा में यह बात भी मान ली गई है कि सब लोगों को वोट का अधिकार दे देना ही काफी नहीं, अपितु लोगों को सामाजिक समानता और आर्थिक सुरक्षा प्रदान करके इस योग्य बनाया जाना चाहिए कि वे वोट के अधिकार का समुचित प्रयोग भी कर सकें।

जब ऐसी स्थिति आ जाएगी कि लोग ऊंच – नीच या धनी और निर्धन के भेद – भाव को भूलकर अपनी स्वतन्त्र इच्छा से वोट दे सकेंगे, तभी प्रजातन्त्र सफल हो सकेगा। स्वाधीनता के बाद भारत ने स्वेच्छापूर्वक प्रजातन्त्र को अपनाया है। भारत शान्तिप्रिय देश है। प्रायः सभी प्रजातन्त्रीय देश शान्तिप्रिय होते हैं और एकतन्त्रात्मक देशों की प्रवृत्ति युद्ध की ओर रहती है।

संसार के अनेक बड़े – बड़े युर व्यक्तियों की महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए ही लड़े गए थे। संक्षेप में, प्रजातन्त्र अन्य सव शासन प्रणालियों की अपेक्षा श्रेष्ठ प्रणाली है। इसमें मनुष्य के व्यक्तित्व के विकास पर सबसे अधिक व्यान दिया जाता है। प्रजातन्त्र में देश के निवासियों में परस्पर सहिष्णुता की भावना रहती है। समय की वर्तमान गति को देखते हुए प्रजातन्त्र का भविष्य अत्यन्त उज्ज्वल दीख पड़ता है।

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