रेडियो का महत्व पर निबंध-radio par nibandh in hindi

दोस्तों आज का हमारा टॉपिक रेडियो के महत्व (radio par nibandh in hindi) से संबंधित जिसे हम रेडियो के लाभ – हानि और रेडियो का क्या महत्त्व है इस रेडियो के निबंध से समझेंगे।

रेडियो का महत्व पर निबंध-radio par nibandh in hindi

रेडियो का महत्व पर निबंध

बीसवीं बाताब्दी में एक से एक बढ़कर वैज्ञानिक आविष्कार हुए हैं। इस शताब्दी के विलकुल प्रारम्भ में ही अर्थात् १६०१ में रेडियो का आविष्कार हुआ, जो उस समय महान्, पाश्चर्यजनक आविष्कार समझा गया। भले ही आज रेडियो लोगों के लिए इतना अधिक परिचित हो गया है कि लोगों को उसमें कोई नवीनता या चमत्कार प्रतीत नहीं होता, किन्तु यदि जरा – सा ध्यान से देखा जाए और रेडियो के विविध उपयोगों पर दृष्टिपात किया जाए, तो ऐसा अनुभव होने लगता है कि रेडियो जादू से किसी प्रकार कम नहीं है।

पहले सम्बाद तार द्वारा भेजे जाते थे। तार में से बिजली गुजरती थी। विजली की चाल १८६००० मील प्रति सैकिंड है। बिजली के इस वेग के कारण ही तार द्वारा सम्बाद हजारों मील दूर कुछ सैकिंडों में ही पहुंच जाते थे। परन्तु हजारों मील दूर तक तार लगाना और उसको ठीक अवस्था में बनाए रखना कम कठिनाई का काम नहीं था।

आंधी – तूफान के कारण अथवा शरारती लोगों के उपद्रवों के कारण तार टूट जाते थे या कट जाते थे और उस दशा में तार द्वारा सम्वाद भेज पाना सम्भव नहीं होता था। विज्ञानवेत्ताओं के मन में यह बात आई कि कोई ऐसा उपाय भी होना चाहिए, जिसके द्वारा तार के बिना भी विद्युत् की तरंगों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक भेजा जा सके। इस सम्बन्ध में बंगाल के डा . जगदीशचन्द्र वसु और इटली के मार्कोनी ने अनेक परीक्षण किए।

जगदीपा चन्द्र वसु ने १८५६ में बंगाल के गवर्नर की उपस्थिति में रेडियो तरंगों द्वारा एक पटाखा छोड़कर और घण्टी बजाकर दिखाई। इन दोनों परीक्षणों में बिजली की तरंगें बिना तार के एक स्थान से दूसरे स्थान तक भेजी गई थीं। परन्तु रेडियो के बाकायदा आविष्कार का श्रेय मार्कोनी को दिया जाता है। १६०१ उसने इंग्लैंड से न्यूजीलैंड तक रेडियो द्वारा समाचार भेजकर अपने प्राविष्कार की धाक सारे संसार में जमा दी।

रेडियो के आविष्कार से कई नई सुविधाएं भी मिल गई। पहले समुद्री जहाजों और विमानों के पास सम्बाद नहीं भेजे जा पाते थे। समुद्री जहाजों को यदि कोई सन्देश बन्दरगाह पर भेजना होता था, तो वे समुद्र में बिछे हुए तारों का उपयोग करते थे। ये तार समुद्र की तली में बिछे हुए हैं। बीच – बीच में जहां – तहां पानी में सब ओर से बन्द ढोल तेरा दिए गए हैं, जिनका सम्बन्ध नीचे के तारों से है।

जहाण इन डोलों के पास पहुंचकर केबिल द्वारा बन्दरगाह तक सम्बाद भेज देते थे। परन्तु यदि जहाज एकाएक डूबने लगे, या उसपर किसी शत्रु जहार का माक्रमण हो जाए और वह केबिल की लाइन के पास तक न पहुंच जाए, तो वह सम्ब द नहीं भेज सकता था।

परन्तु रेडियो के आविष्कार के बाद सब जहाजों औ सब विमानों में रेडियो यन्त्र लगा दिए गए हैं, जिससे वे स्थल के साथ अपना सम्पर्क निरन्तर बनाए रहते हैं। न केवल स्थल के साथ, बल्कि समुद्र में चलते हुए अन्य जहाजों के साथ भी सम्पर्क बनाए रहते हैं। इससे अब संकट काल में विमानों और जहाजों को सहायता भेजी जा सकती है। यद्यपि शुरू में रेडियो का आविष्कार सम्बाद – प्रेषण के लिए ही हुआ था, परन्तु धीरे – धीरे इसका उपयोग अन्य कार्यों के लिए किया जाने लगा।

लगभग सभी देशों में रेडियो प्रसारण केन्द्र बन गए हैं, और उन केन्द्रों से मधुर संगीत, रोचक नाटक इत्यादि के कार्यक्रम और समाचार प्रसारित किए जाते हैं। रेडियो द्वारा मनमाना प्रचार भी किया जा सकता है। रोचक कार्यक्रम इसलिए प्रसारित किए जाते हैं कि उनके लोभ में लोग रेडियो अपने घर में रखें और समय – समय सरकारी प्रचार की बातें भी सुन सकें। युद्ध – काल में रेडियो का महत्त्व और भी अधिक बढ़ गया था।

न केवल प्रचार की दृष्टि से मित्रराष्ट्र और धुरी – राष्ट्र एक – दूसरे को नीचा दिखाने का प्रयत्न करते थे, अपितु सेनाओं में परस्पर सम्बाद भेजने के लिए भी रेडियो का उपयोग किया जाता था। शत्रु के गुप्तचर अपने छोटे – छोटे प्रसारक यन्त्रों से महत्त्वपूर्ण समाचार अपने देशों को भेज देते थे।

पनडुब्बियों, जहाजों और बमवर्मक विमानों को अपने मुख्यालयों से आदेश रेडियो पर ही मिल जाते थे और जो कुछ जानकारी के मुख्या लय को भेजना चाहते थे, वह भी रेडियो द्वारा भेजी जाती थी। युद्ध की समाप्ति के दिनों में जर्मनी ने रेडियो द्वारा नियन्त्रित उड़नबम तैयार किए थे। ये उड़नवम बी -1 और वी -२ नाम के राकेट थे, जिनकी मार ३०० या ४०० मील तक थी। ये रेडियो द्वारा नियन्त्रित रहते थे और रेडियो द्वारा ही इनकी दिशा भी नोड़ी जा सकती थी।

द्वितीय विश्व – युद्ध समाप्त हो जाने के बाद इन राकेटों में बहुत अधिक सुधार हुआ है और रूस और अमेरिका ने रेडियो द्वारा नियन्त्रित ऐसे प्रक्षेपणास्त्र तैयार किए हैं, जो हजारों मील दूर जाकर अपने ठीक निशाने पर चोट कर सकते हैं। रूस और अमेरिका ने जो भूमि के चारों ओर घूमने वाले नकली उपग्रह छोड़े हैं, उनमें भी रेडियो – नियन्त्रण का बहुत महत्त्वपूर्ण कार्य था।

जिन राकेटों द्वारा ये उपग्रह ले जाए गए थे, उनकी दिशा का नियन्त्रण रेडियो – सरंगों द्वारा किया जाता था। रेडियो ईथर की तरंगों के कारण अपना कार्य करता है। ईथर एक सूक्ष्म पदार्थ है, जो सारे विश्व – ब्रह्मांड में भरा हुआ है। किन्तु कमरे में भरी हुई हवा की भांति वह हमें दिखाई नहीं पड़ता और न हम उसे अनुभव कर पाते हैं।

बिजली द्वारा ईथर में तरंगें उठाई जा सकती हैं। जब ऐसी तरंगें उठाई जाती हैं, तो वे सारे संसार में फैल जाती हैं और संसार के किसी भी भाग में रेडियो – ध्वनि – ग्राहक यन्त्र द्वारा उन तरंगों को ग्रहण किया जा सकता है। रेडियो – ध्वनि – प्रसारक यन्त्र बिजली द्वारा ईथर में तरंगें उत्पन्न करते हैं और संसार के किसी भी भाग में रखे हुए रेडियो – ध्वनि – ग्राहक यन्त्र उन तरंगों को ग्रहण कर सकते हैं।

इसीलिए हम दिल्ली में बैठे हुए मास्को, लन्दन और न्यूयार्क के रेडियो स्टेशनों के कार्यक्रम सुन सकते हैं। रेडियो की इन तरंगों का एक महत्त्वपूर्ण उपयोग रडार के रूप में किया जाता है। रडार यन्त्र का आविष्कार द्वितीय महायुद्ध के दिनों में हुआ था। रडार मन्त्र की सहायता से हम आंखों से न दीख पड़ने वाली सैकड़ों मील दूर की वस्तु का भी पता लगा सकते हैं, उनकी दूरी और दिशा जान सकते हैं।

युद्ध में रडार का उप योग शत्रु के विमानों की दिशा और दूरी जानने के लिए किया जाता था। रडार यन्त्र रेडियो तरंगों द्वारा ही कार्य करता है। रेडियो ने हमारे दैनिक जीवन में काफी बड़ा परिवर्तन कर दिया है। पहले साधारण नागरिक के पास मनोरंजन का एकमात्र साधन सिनेमा ही था ; किन्तु अब रेडियो द्वारा एक और नया साधन प्राप्त हो गया है, जो सिनेमा से भी सस्ता है।

रेडियो द्वारा हम घर बैठे आराम से अच्छे से अच्छे संगीतकारों का संगीत, कवि – सम्मेलन, नाटक इत्यादि सुन सकते हैं। रेडियो केवल मनोरंजन का साधन नहीं, अपितु ज्ञानवर्धन का भी बड़ा माधन है। संसार में घटने वाली सब महत्त्वपूर्ण घटनाओं के समाचार रेडियो पर नित्य दिन में कई बार सुनाए जाते हैं। रेडियो ने समाचार – पत्रों को बहुत कुछ अन्यथा सिद्ध – सा कर दिया है, क्योंकि रेडियो पर समाचार सुन लेने के बाद समाचार – पत्र पढ़ने की इच्छा केरल उन्हीं लोगों को रहती है, ओ हरएक घटना को पूरे विस्तार के साथ पढ़ना चाहते हैं।

इतना ही नहीं, लगभग सभी क्षेत्रों की रुचि और आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए उनके काम की बातें रेडियो पर बताई जाती हैं। व्यापारियों के लिए बाजार भाव, किसानों के लिए मौसम के हाल, स्त्रियों के लिए घरेलू काम – धन्धे, और बच्चों के लिए अलग कार्यक्रम प्रसारित किए जाते हैं। इनके अतिरिक्त भारत में रेडियो विभाग सरकार के अपने हाथ में है और व्यक्तिगत तौर पर लोगों को ध्वनि – प्रसारण की सुविधा या अधिकार नहीं है।

इन समय देश में दिल्ली, मद्रास, कलकत्ता, बम्बई, लखनऊ, नागपुर इत्यादि २५, ध्वनि – प्रसारण – केन्द्र कार्य कर रहे हैं। इन सबका नियन्त्रण दिल्ली के आकाशवाणी कार्यालय से होता है। रेडियो का अभी हमारे देश में उतना प्रचार नहीं हुआ, जितना कि होना चाहिए, या हो सकता है। इसका कारण यह है कि रेडियो यन्त्र महंगे हैं और लाइ सेंस शुल्क भी अधिक है। ज्यों – ज्यों देश की समृद्धिबढ़ेगी, त्यों – त्यों लोग अधिका धिक संख्या में रेडियो खरीदेंगे।

प्राजकल सरकार गांवों में भी रेडियो यन्त्र रख वाने की व्यवस्था करवा रही है। यदि प्रत्येक गांव में एक भी रेडियो हो, तो उससे सब ग्रामवासी ताजे समाचार सुन सकते हैं और अन्य ज्ञान की बातें जान सकते हैं। अभी तक रेडियो पर केवल आवाज़ सुनाई पड़ती थी, किन्तु बोलने वाले व्यक्तियों की प्राकृति दिखाई नहीं पड़ती थी।

किन्तु अब टेलीवीजन के रूप में रेडियो ने एक और प्रगति की है। टेलीवीजन में न केवल पावाज सुनाई पड़ती है, अपितु बोलने वालों या अभिनय करने वालों का चित्र भी दिखाई पड़ता है। टेलीवीजन का प्रयोग भारत में शीघ्र ही प्रारम्भ होने वाला है। टेलीवीजन से लोग घर बैठे सिनेमा का आनन्द ले सकेंगे तथा ज्ञानवर्धन के लिए भी अनेक शिक्षा त्मक कार्यक्रम टेलोवीजन पर प्रसारित किए जा सकेंगे।

दासता के दो सौ वर्षों में हमारी संस्कृति बहुत कुछ धुंधली और लुप्त – सी हो गई थी। महत्त्वपूर्ण विषयों पर योग्य विद्वानों की वार्ताएं प्रसारित की जाती हैं, जिनसे सभी लोग लाभ उठा सकते हैं। जिन लोगों को पुस्तक पढ़ना भार मालूम होता है, उनके लिए रेडियो ज्ञानवर्धन का बहुत ही सुगम उपाय है। भारत में १ ९ २७ में रेडियो स्टेशन बनाया गया था।

भारत में रेडियो विभाग सरकार के अपने हाथ में है और व्यक्तिगत तौर पर लोगों को ध्वनि – प्रसारण की सुविधा या अधिकार नहीं है। इन समय देश में दिल्ली, मद्रास, कलकत्ता, बम्बई, लखनऊ, नागपुर इत्यादि २५, ध्वनि – प्रसारण – केन्द्र कार्य कर रहे हैं। इन सबका नियन्त्रण दिल्ली के आकाशवाणी कार्यालय से होता है। रेडियो का अभी हमारे देश में उतना प्रचार नहीं हुआ, जितना कि होना चाहिए, या हो सकता है।

इसका कारण यह है कि रेडियो यन्त्र महंगे हैं और लाइ सेंस शुल्क भी अधिक है। ज्यों – ज्यों देश की समृद्धिबढ़ेगी, त्यों – त्यों लोग अधिका धिक संख्या में रेडियो खरीदेंगे। प्राजकल सरकार गांवों में भी रेडियो यन्त्र रख वाने की व्यवस्था करवा रही है। यदि प्रत्येक गांव में एक भी रेडियो हो, तो उससे सब ग्रामवासी ताजे समाचार सुन सकते हैं और अन्य ज्ञान की बातें जान सकते हैं।

अभी तक रेडियो पर केवल आवाज़ सुनाई पड़ती थी, किन्तु बोलने वाले व्यक्तियों की प्राकृति दिखाई नहीं पड़ती थी। किन्तु अब टेलीवीजन के रूप में रेडियो ने एक और प्रगति की है। टेलीवीजन में न केवल पावाज सुनाई पड़ती है, अपितु बोलने वालों या अभिनय करने वालों का चित्र भी दिखाई पड़ता है।

टेलीवीजन का प्रयोग भारत में शीघ्र ही प्रारम्भ होने वाला है। टेलीवीजन से लोग घर बैठे सिनेमा का आनन्द ले सकेंगे तथा ज्ञानवर्धन के लिए भी अनेक शिक्षा त्मक कार्यक्रम टेलोवीजन पर प्रसारित किए जा सकेंगे। दासता के दो सौ वर्षों में हमारी संस्कृति बहुत कुछ धुंधली और लुप्त – सी हो गई थी।

लोगों को अन्न – वस्त्र जुटाना ही कठिन था, कला और संस्कृति की ओर किसका ध्यान जाता है किन्तु स्वाधीनता के बाद देश की समृद्धि बढ़ने के साथ साथ लोगों में कला की रुचि बढ़ रही है। इस रुचि को संवारने सुधारने में रंग मंचों और चित्रपटों के साथ – साथ रेडियो भी बहुत महत्त्वपूर्ण भाग ले रहा है। शिक्षण के माध्यम की दृष्टि से और एक नई संस्कृति के विकास की दृष्टि से नवीन भारत के निर्माण में रेडियो का महत्त्वपूर्ण योग रहेगा।

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