पश्चिमी एशिया में क्रांति की शुरुआत और उसके प्रभाव निबंध  | Revolution in west asia and its effects

पश्चिमी एशिया में क्रांति की शुरुआत और उसके प्रभाव निबंध  | Revolution in west asia and its effects

पश्चिमी एशिया में क्रांति और उसके प्रभाव निबंध

सोलहवीं और सत्रहवीं शताब्दियों में राजनीतिक परिस्थितियों और प्रौद्योगिक क्रांति का लाभ उठाकर यूरोपियन देशों ने एशिया और अफ्रीका के लगभग सभी देशों पर अधिकार कर लिया था। पश्चिमी एशिया के देश यूरोप के पास पड़ते थे और आर्थिक दृष्टि से बहुत पिछड़े हुए थे, इसलिए इनपर अधिकार करना यूरोपियन देशों के लिए आसान था। इसके अतिरिक्त भारत आने के लिए भी समुद्री मार्ग भूमध्य सागर और लाल सागर में से होकर था।

इस मार्ग को सुरक्षित बनाए रखने के लिए यह आवश्यक था कि भूमध्य सागर के दक्षिणी तट तथा लाल सागर के दोनों ओर के देशों पर यूरोपियन लोगों का कब्जा बना रहे। परिणाम यह हुआ कि इन सब देशों पर यूरोपियन देशों ने बड़ी कठोरतापूर्वक अपना अधि कार जमाए रखा और इस बात का हर एक सम्भव प्रयत्न किया कि ये देश मार्थिक, सामाजिक, राजनीतिक और सैनिक दृष्टि से पिछड़े रहें।

पश्चिमी एशिया में संसार के सबसे बड़े मिट्टी के तेल के कुएं हैं। ईरान, ईराक, साउदी अरब, कुवैत प्रादि से संसार का एक तिहाई से भी अधिक पैट्रोलियम निक लता है। इस तेल की युरोपियन देशों को बहुत आवश्यकता रहती है। इस तेल को निकालने और बेचने का सारा अधिकार यूरोप और अमेरिका की कम्पनियों के हाथों में है।

इस तेल के लिए भी पश्चिम के देश इस प्रदेश पर कब्जा जमाए रखना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने इन सब देशों में राजाओं को अपने हाथ की कठपुतली बनाया हुआ था। फ्रांस और इंग्लैंड जैसे प्रजातन्त्रवादी देशों ने भी इन देशों में राजतंत्र को बनाए रखने में अपना हित देखा। राजाओं को अपने विलास के लिए यथेष्ट धन – राशि दे दी जाती थी और उसके बाद देश की बाकी जनता की चिंता किसीको नहीं थी। लोग बेहद गरीब थे। शिक्षा का कहीं नाम नहीं था।

जीवन की शेष सुविधाओं का तो कहना ही क्या ? परन्तु बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में ही पूर्वीय देशों में राजनीतिक चेतना जागी। १ ९ १७ में रूस में साम्यवादी क्रांति हुई और उसका प्रभाव सारे संसार पर पड़ा। पराधीन देशों को यह अनुभव हुआ कि पराधीनता उनके सब दुःखों की जड़ है। इसलिए उनका सबसे पहला लक्ष्य स्वाधीनता होना चाहिए। जब कोई देश स्वाधीन होगे के लिए दृढ़ संकल्प कर ले, तो फिर उसे देर तक गुलाम नहीं रखा जा सकता।

एक के बाद एक, सभी देना विदेशियों के शासन से छुटकारा पाने लगे। परन्तु स्वाधीनता की इस दौड़ में भी पश्चिमी एशिया के देश सबसे पिछड़े रहे। द्वितीय विश्व युद्ध में इन देशों में से कुछ ने स्वाधीनता पाने की आशा की थी और कुछ असंगठित प्रयत्न भी किया था, परन्तु उन दिनों मित्रराष्ट्रों की सेनाएं बहुत बलवान थीं, इसलिए वे देश स्वाधीनता पाने में सफल न हुए। विश्व युद्ध के बाद स्थिति में बहुत परिवर्तन हो गया। पहले यहां ब्रिटेन और फ्रांस सबसे बड़ी शक्तियां समझे जाते थे, वहां पुद्ध के बाद सबसे बड़ी शक्तियां रूस और अमेरिका हो गए।

रूस और अमेरिका दोनों का ही कोई स्वार्थ मध्य एशिया देशों के पराधीन रहने में नहीं था। ब्रिटेन और फ्रांस कमजोर पड़ गए थे, इसलिए एक – एक करके पश्चिमी एशिया के . देश स्वतन्त्र होने लगे। इस दिशा में पहला प्रयत्न ईरान के प्रधान मंत्री डाक्टर मुसादिक ने किया था। उसने ईरान के तेल का राष्ट्रीयकरण कर दिया था।

परन्तु पश्चिमी देशों ने आर्थिक और राजनीतिक दबाव डालकर डाक्टर मुसादिक को प्रधान मन्त्री पद से हटवा दिया और ईरान के शाह के हाथ में फिर पूरी सत्ता आ गई, जिसके फलस्वरूप पश्चिमी राष्ट्रों द्वारा ईरान का शोषण फिर जारी हो गया। उसके बाद मिस्र में सफल क्रान्ति हुई। मिस्र में पहले राजा फारूख शासन कर रहा था।

उसका शासन बहुत ही दुर्बल और भ्रष्टाचारपूर्ण था। मिस्र के सैनिक अफसरों ने क्रान्ति करके शासन अपने हाथ में ले लिया। राजा फारूख इटली भाग गया। कुछ समय बाद मिस्र की बागडोर कर्नल नासिर के हाथों में आ गई। उसने अपने देश की उन्नति के लिए स्वेज नहर का राष्ट्रीयकरण कर दिया, जिससे मिस को बहुत आमदनी होने लगी। स्वेज के राष्ट्रीयकरण से इंग्लैंड और फ्रांस बहुत चिढ़े और उन्होंने मिस्र के विरुद्ध बाकायदा लड़ाई छेड़ दी।

उनकी फौज पोर्ट सईद में पहुंच गई। परन्तु रूस के धमकाने पर अंग्रेजों और झांसीसियों को प्रसफल होकर वापस लौट जाना पड़ा। इस सफलता से सारे पश्चिमी एशिया में एक नवा उत्साह फैल गया। अरब देशों में राष्ट्रीयता की भावना पनप उठी। उन्होंने अनुभव किया कि हमारी दुर्दशा का सारा कारण यह है कि विदेशी लोग हमारे तेल को ले जाते हैं।

यदि हम इस तेल का उपयोग अपने हित के लिए कर सकें या इसका उचित मूल्य पा सकें तो हमारी दशा शीघ्र ही सुधर सकती है। कर्नल नासिर ने अरब राष्ट्रों को स्वाधीन और संगठित करने का बीड़ा उठाया। सबसे पहली सफलता उसे यह मिली कि सीरिया और निन, दोनों देश आपस में मिल गए और उन्होंने अपने आपको ‘ संयुक्त अरब गणतन्त्र ‘ नाम दिया।

कुछ ही समय बाद यमन भी इस गणतन्त्र में सम्मिलित हो गया। पश्चिमी देश मिल को नीचा दिखाने के लिए तरह – तरह के हथकंडे सोच ही रहे थे कि ईराक में सैनिक क्रान्ति हो गई। वहां के राजा और प्रधान मन्त्री को मार डाला गया और ब्रिगेडियर अब्दुल करीम कासिम के नेतृत्व में सैनिक सरकार काम करने लगी।

कुछ ही समय पहले संयुक्त अरब गणतन्त्र के मुकाबले में ईराक और जोर्डन ने अपना संघ बना लिया था। ईराक का राजा फैजल जोर्डन के राजा का भाई लगता था। परन्तु ईराक बड़ा देश था और जोर्डन तुलना में बहुत छोटा। इसलिए जोर्डन का राजा ईराक पर फिर अपना अधिकार करने के लिए प्रयत्न न कर सका।

ईराक की क्रान्ति के समय अंग्रेज और अमेरिकन सेनाएं जोर्डन और लेबनान में पहुंच गई थीं, क्योंकि उन्हें भय था कि इन देशों में भी राष्ट्रवादी तत्त्व कठपुतली सरकारों को उलट देंगे। दूसरी ओर अरब राष्ट्रों को यह भय था कि ये सेनाएं ईराक की क्रान्ति को कुचलने के लिए भेजी गई हैं। परन्तु इस समय संसार में शक्ति – संतुलन ऐसा है कि एकाएक युद्ध छेड़ बैठना किसी भी देश के लिए न सम्भव है और न भला।

इसलिए पश्चिमी एशिया में युद्ध को घटाएं दूसरी बार घुमड़कर फिर बिना बरसे ही टल गई। इस समय पश्चिमी एशिया में स्थिति यह है कि मिस्र, सीरिया, यमन, ईराक और सूडान विदेशियों के चंगुल से छुटकारा पा चुके हैं और उन्हें अपने भाग्य का निर्णय स्वयं करने का अधिकार मिल गया है। ईरान, जोर्डन और साउदी अरब पर अभी तक पश्चिमी देशों का प्रभाव है। वस्तुतः इन देशों में सरकारें पश्चिमी देशों की सक्रिय सहायता से ही चल रही हैं।

कुछ कहा नहीं जा सकता कि किस समय इन देशों में भी असन्तुष्ट जनता या सेना कान्ति कर बैठे और वहां से भी पश्चिमी देशों का प्रभाव समाप्त हो जाए। कुछ समय पहले ‘ बगदाद पैक्ट ‘ नाम से एक सुरक्षा करार अमेरिका की प्रेरणा पर किया गया था। अब ईराक के पृथक् हो जाने के कारण उस करार की जड़ हिल गई प्रतीत होती है। ईराक की क्रान्ति का अन्य देशों पर बड़ा उत्साहवर्धक प्रभाव पड़ेगा।

दूसरी ओर उत्तरी अफ्रीका में लीबिया, ट्यूनिशिया और मोरक्को स्वतन्त्र हो चुके हैं। यद्यपि इन देशों की सैनिक स्थिति बहुत सुदृढ़ नहीं है, परन्तु वैधानिक तौर पर इन्हें स्वतन्त्रता मिल चुकी है और एक बार स्वतन्त्र हो चुकने के बाद यदि इसमें से किसीपर आक्रमण हो, तो संयुक्तराष्ट्र उसमें दखल दे सकता है। अल्ली रिया में कई वर्षों से लड़ाई जारी है।

वहां की राष्ट्रवादी सेनाएं विदेशी फ्रांसीसी शासकों के विरुद्ध लड़ाई लड़ रही हैं। राष्ट्रवादी सेनाएं बाकायदा संगठित सेनाएं नहीं हैं, अपितु बिखरे हुए दल हैं, जो गुरिल्ला डंग की लड़ाई लड़ रहे हैं। फ्रांसी सियों ने एक लाख के लगभग अल्जीरिया के राष्ट्रवादियों को मौत के घाट उतार दिया है, किन्तु वहां अभी लड़ाई जारी है और पाशा बंधती है कि यह लड़ाई अल्जीरिया की स्वाधीनता मिलने पर ही समास होगी।

साम्राज्यवाद का चंगुल ढीला पड़ रहा है। अभी हाल में ही देखते – देखते कितने ही अफ्रीकी देश स्वतन्त्र हो गए हैं। हाल में ही स्वतन्त्र होने वाले इन देशों में घाना, कांगो, कॅमेरून, टोगो, माली, मैलेगसी, सोमालिया, भूतपूर्व फ्रांसीसी कांगो, दाहोमी, ऊपरी बोल्टा, नाइजर, आइवरी कोस्ट, गैबन, छड, मध्य अफोकी गणतन्त्र और साइप्रस प्रादि देशों के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

ध्यान देने योग्य बात यह है कि इन देशों में से साइप्रस के अतिरिक्त अन्य किसी देश ने स्वाधीनता के लिए सशस्त्र संघर्ष नहीं किया। अन्तर्राष्ट्रीय परिस्थितियों का दवाव ही इन्हें स्वाधीन कराने में समर्थ हुआ है। इस प्रकार पश्चिमी एशिया में इस समय स्वाधीनता के लिए संघर्ष का संग्राम धीरे – धीरे किन्तु स्थिर रूप से प्रगति कर रहा है।

संसार के अनेक राजनीतिज्ञों ने यह सम्मति प्रकट की है कि राष्ट्रीयता की इस प्रचंड लहर को रोका नहीं जा सकता। पहले साम्राज्यवादी देशों की सबसे बड़ी सुविधा यह थी कि वे आर्थिक सहायता देकर या रोककर दूसरे देशों पर अपना प्रभाव डाल सकते थे। परन्तु अब साम्यवादी देशों के मैदान में प्रा जाने के कारण स्थिति बिल्कुल बदल गई है।

जिन देशों को साम्राज्यवादी देश सहायता देने से इन्कार कर देते हैं, उन्हें तुरन्त साम्य वादी देशों से सहायता प्राप्त होने लगती है। ऐसा प्रतीत होता है कि साम्राज्यवाद और पूंजीवाद का शिकंजा ढीला पड़ चुका है और अब कुछ समय बाद चिर काल से शोषित और शासित चले आ रहे देश भी सुख की सांस ले सकेंगे।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *