भारतीय शिक्षा की वर्तमान समस्या पर निबंध

भारतीय शिक्षा की वर्तमान समस्या पर निबंध

स्वाधीनता से पहले विदेशी सरकार शिक्षा की ओर बहुत कम ध्यान देती थी। यद्यपि यह सत्य है कि वर्तमान शिक्षा प्रणाली अंग्रेजों की ही चलाई हुई है और हमें अंग्रेज़ों के चंगुल से छुड़ाने में बहुत बड़ा हाथ इस शिक्षा का भी है, फिर भी इसमें सन्देह नहीं कि अंग्रेजों ने इस शिक्षा प्रणाली को ठीक उल्टे उद्देश्य से चलाया था।

उनका लक्ष्य यह था कि पश्चिमी शिक्षा देकर भारतवासियों को पश्चिमी रंग में रंग दिया जाए और राजनीतिक अधीनता के अतिरिक्त उनपर सांस्कृतिक अधी नता भी थोप दी जाए। उन्होंने पश्चिमी शिक्षा पश्चिम की दृष्टि में भारतीय सभ्यता और इतिहास को हीनतर सिद्ध करने के लिए प्रचलित की थी। यह शिक्षा केवल किताबी शिक्षा थी। इसमें सारा जोर साहित्य के अध्ययन पर दिया जाता था। भूगोल, इतिहास, गणित आदि का अध्यापन बहुत कम था। और जो कुछ था, वह भी अंग्रेजी के माध्यम से किया जाता था।

पहले बालक को कई वर्ष अंग्रेजी का ज्ञान प्राप्त करने में लग जाते थे और उसके बाद वह भूगोल, इतिहास इत्यादि पड़ने योग्य हो पाता था। इस शिक्षा को प्राप्त करने के बाद जीविकोपार्जन का उसके पास एक ही मार्ग रह जाता था – नौकरी ; चाहे वह नौकरी दफ्तर में बाबूगीरी की हो, चाहे स्कूल में अध्यापन की। शिक्षित लोगों की बेकारी की समस्या स्वाधीनता प्राप्त होने से पहले ही देश के सामने आ खड़ी हुई थी।

विश्वविद्यालयों के बी ए ०, एम . ए . पास करने वाले स्नातक परकटे पंछियों की भांति होते थे, जो केवल नौकरी करने के लिए अधीर होते थे। किन्तु नौकरियों की संख्या सीमित होने के कारण उन लोगों को नौकरियां नहीं मिल पाती थीं। अनेक शिक्षाशास्त्रियों ने और राजनीतिक नेताओं ने इस बात को अनुभव किया था और शिक्षा का रूप बदलने पर जोर दिया था।

व्यावसायिक शिक्षा और वेसिक शिक्षा इस समस्या को हल करने के लिए ही प्रारम्भ की गई थीं। किन्तु स्वाधीनता मिलने के बाद देश में प्रजातन्त्र स्थापित हुआ है और सरकार ने यह निश्चय किया है कि यथाशीन देश के सभी लोगों को शिक्षित कर देना है। इसलिए शिक्षा का प्रचार बहुत तेजी से बढ़ रहा है। किन्तु शिक्षा का प्रचार बढ़ने के साथ – साथ अनेक नई – नई समस्याएं उपस्थित हो रही हैं।

सबसे बड़ी और पहली समस्या तो यह है कि आजकल जितनी बड़ी संख्या में विद्यार्थी शिक्षा पाने के लिए तैयार होते हैं, उनके लिए विद्यालयों और महा विद्यालयों में स्थान नहीं होता। नये उत्साह से भरकर लोग विज्ञान, चिकित्सा, इंजीनियरिंग प्रादि सीखने के लिए महाविद्यालयों की ओर दौड़ते हैं, किन्तु सब जगह से एक ही उत्तर मिलता है स्थान नहीं है। यहां तक कि साहित्य की बी ० ए ०, एम ० ए ० कक्षाओं में भी प्रवेश मिलना कठिन हो गया है। दूसरी समस्या अध्यापकों की है।

अध्यापकों का स्थान समाज में जैसा उच्च और सम्मानपूर्ण होना चाहिए, वैसा अभी नहीं है। इसका कारण अध्यापकों के वेतन की अल्पता है। वर्तमान समाज – व्यवस्था में मनुष्य का मान उसके धन के कारण होता है। इसलिए गरीब अध्यापक समाज में प्रतिष्ठा तोपा ही नहीं सकता ; अनेक बार उसे अपने परिवार का निर्वाह करना भी कठिन होता है।

अपनी आय को बढ़ाने के लिए उसे बहुत बार ट्यूशने करनी पड़ती हैं, जिनके कारण उसका सम्मान और भी घट जाता है। घर पर आकर पढ़ाने वाले अध्यापक को न तो छात्र ही आदर की दृष्टि से देख पाता है और न उसके माता – पिता। शिक्षा – क्षेत्र में वेतन की अल्पता का एक और दुष्परिणाम यह हुआ है कि अधिक मेधावी और योग्य व्यक्ति शिक्षा क्षेत्र में नहीं आना चाहते।

वे व्यवसाय या सरकारी नौकरियों के पीछे भागते हैं, जहां वेतन अपेक्षाकृत काफी अधिक होते हैं। इसलिए न केवल अध्यापक का गौरव बड़ाने के लिए, अपितु योग्य व्यक्तियों को शिक्षा – क्षेत्र में लाने और बनाए रखने के लिए भी अध्यापकों के वेतन बढ़ाए जाने चाहिए। हमारी शिक्षा की तीसरी और बहुत बड़ी समस्या छात्रों की अनुशासन हीनता की समस्या है। प्राचीनकाल में गुरुमों और शिष्यों के सम्बन्ध बहुत मधुर होते थे।

शिष्य विनीत और श्रद्धालु होते थे। गुरु भी शिष्यों से प्रेम करते थे। परन्तु प्राजकन शिष्यों में से गुरुओं के प्रति सम्मान की भावना उड़ गई है। अध्यापकों की हंसी उड़ाना, मुंह पर तू – तड़ाक उत्तर देना तो मामूली बात है। ऐसे किस्से भी बहुत हो चुके हैं, जिनमें परीक्षा में नकल करते हुए पकड़े जाने पर छात्रों ने अध्यापकों को धमकाया और कत्ल कर दिया। यह गुरू – शिष्य के सम्बन्धों के पतन की चरम सीमा है।

छात्रों की अनुशासनहीनता एक और रूप में भी सामने आती है और यह है हड़ताल का रूप। किसी भी छोटी या बड़ी, उचित या अनुचित बात को लेकर छात्र लोग हड़ताल कर देते हैं। न केवल अपनी शिक्षा – संस्था में, अपितु सारे शहर में हंगामा करते हैं। फिर छात्रों की अनेक यूनियनें और फैडरेशन बन गए हैं। इनके कारण एक नगर के छात्रों की उचित या अनुचित हड़ताल का समर्थन सारे देश के छात्रों द्वारा किया जाता है।

अनेक बार ये हड़ताली छात्र न केवल अपने अध्यापकों पर हाथ उठाते हैं, अपितु पुलिस तक से मोर्चा लेते हैं। यह भी बड़ी शोचनीय अवस्था है। पिछले कुछ वर्षों में इलाहाबाद, लखनऊ और बनारस के विश्व विद्यालयों में बड़ी – बड़ी और लम्बी हड़तालें हो चुकी हैं। इन हड़तालों की मांग प्रायः यह रही है कि अमुक अध्यापक को हटाया जाए, या न हटाया जाए ; जैसे छात्र इस बात के उचित निर्णायक हों कि कौन अध्यापक योग्य है और कौन अयोग्य।

छात्रों की अनुशासनहीनता के कारण अनेक हैं। कुछ तो अध्यापकों की कम कोरी, कुछ अध्यापकों और संस्थाओं के अधिकारियों को आपत्ती गुटबन्दी और कुछ महात्मा गांधी द्वारा देश को दिए गए असहयोग अस्त्र का दुष्प्रयोग इत्यादि इसके कारण हैं। इन कारणों को हटा पाना जितना आवश्यक है, उतना सरल नहीं है। इस समय तो अनुशासनहीनता दिनों – दिन बढ़ती पर ही है।

यद्यपि शिक्षा को सस्ता करने के लिए बहुत प्रयत्ल किए गए हैं, फिर भी शिक्षा दिनों – दिन महंगी होती जा रही है। मध्यम वित्त वाले परिवार के लिए बालकों की शिक्षा का व्यय वहन करना बहुत कठिन हो गया है। यद्यपि निःशुल्क शिक्षा का आदर्श सामने रखा जाता है, फिर भी उच्च श्रेणियों में फीमें कम नहीं हैं ; और फीसों की अपेक्षा भी कहीं बढ़ा बोझ पुस्तकों की कीमत का पड़ता है।

आजकल पाठ्यक्रमों में पुस्तकें इतनी अधिक होती हैं और इतनी महंगी होती हैं कि सामान्य व्यक्ति उस बोझ से दब – सा जाता है। इतनी अधिक और महंगी पुस्तकें पाठ्यक्रमों में रखे जाने का कारण प्रार्थिक कुचक्र है। पाठ्यपुस्तकों द्वारा बहुत – से लोग बहुत बड़ी कमाई करते हैं, इसीलिए पाठ्यक्रम में पुस्तक लगवाने के लिए इतनी हाय हाय और भाग – दौड़ होती है। यदि पुस्तकों का बोझा कुछ कम हो जाए, तो शिक्षा की काफी बड़ी समस्या हल हो जाए।

आजकल जहां छात्रों के पढ़ने के लिए विद्यालयों की कमी है, वहां उससे भी अधिक कमी उनके लिए उचित प्रयोगशालाओं, खेल के मैदानों तथा मनोरंजन के स्वस्थ साधनों की है। जब तक ये वस्तुएं उपलब्ध नहीं होती, तब तक शिक्षा अपूर्ण और एकांगी ही रहेगी। शारीरिक स्वास्थ्य भी मानसिक विकास की भांति शिक्षा का अनिवार्य अंग है। शिक्षा का उद्देश्य छात्र को शिष्ट, विनीत और उदार बनाना है।

परन्तु प्राज कल की शिक्षा में नैतिक शिक्षण का प्रभाव है। परिणाम यह होता है कि ज्यों – ज्यों छात्र अधिकाधिक शिक्षित होते जाते हैं, त्यों – त्यों वे अधिकाधिक उच्छं खल, अपिशष्ट और अनुदार होते जाते हैं। इस प्रकार की शिक्षा को कुशिक्षा कहना अधिक उप युक्त होगा ; और ज्यों – ज्यों समाज में ऐसे कुशिक्षित व्यक्तियों की संख्या बढ़ती जाएगी, त्यों – त्यों उसके दुष्परिणाम भी अनेक रूपों में हमारे सामने आते जाएंगे। अंग्रेजों के यहां रहते हमारी मांग यह थी कि अंग्रेज जाएं और उनके साथ अंग्रेजियत जाए।

किन्तु अंग्रेजों के चले जाने के बाद अंग्रेजियत यहां से गई नहीं, उल्टे दिन दूनी, रात चौगुनी बढ़ रही है। पहले यह कहा जाता था कि अंग्रेजी का अध्ययन बालक के मन पर एक अनावश्यक बोझ है, इसलिए अध्यापन अपनी भाषा में होना चाहिए। किन्तु अंग्रेजों के चले जाने के बाद यह कहा जाने लगा है कि अंग्रेजी अन्तरराष्ट्रीय भाषा है और उसके पढ़े बिना बालक के मन का विकास पूर्ण नहीं हो सकता।

अंग्रेजी पढ़ने से नये – नये ज्ञान और विज्ञान के क्षेत्र उसके लिए खुल जाएंगे, इसलिए हरएक बालक को अंग्रेजी अवश्य पढ़ाई जानी चाहिए। इस प्रकार अंग्रेजी ही नहीं, और भी कई भाषाओं का बोझ छात्र के सिर लाद दिया गया है, जो निश्चित रूप से बालक के मानसिक विकास में बाधक सिद्ध होगा। परन्तु प्राशा है कि इस दिशा में शिक्षाशास्त्री शीघ्र हो चेतेंगे और गलतियां सुधार दी जाएंगी। ये हैं हमारी वर्तमान शिक्षा की कुछ ज्वलन्त समस्याएं। सभी शिक्षाशास्त्रियों का ध्यान इनकी ओर लगा हुआ है और वे इन्हें सुलझाने के लिए प्रयत्नशील हैं।

 

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